Posts

Showing posts from April, 2021

मूढ़ता पूर्ण प्रश्न

Vinod Kumar मित्र आप फिर पोथी में पड़ गये ! क्यों 17 के चक्कर में पड़े हो, प्यास बुझाने के लिए एक बोतल पानी काफी है! अब अशोक किस कंपनी के पानी की बोतल प्रयोग करते थे इससे क्या फर्क पड़ता है ! वे पीते तो पानी ही थे अर्थात साधन की पद्दति का ही प्रयोग करते थे जो मोग्लिपुत्त सिखाते थे, जैसे आज भी किसी विश्व-विद्यालय में एक विषय के दर्जनों अध्यापको होते हैं और कई विश्विद्याल मिला दिए जाये तो सैकड़ो अध्यापक हो जाते हैं ! इससे क्या फर्क पड़ता है ? उस विषय का ज्ञान बदल तो नहीं जाता मेरे भाई ! फिर आप मूढ़ पंडितो के प्रश्नों में उलझ गए ! Vinod Kumar अंतर करना तो पंडितो का काम है, उनसे करा लो वे बौद्धों में भी जातियां बना देंगे ! आप पर भी मनुवादियों की संगत का असर आने लगा है, आप भी बिना अंतर किये स्वीकार ही नहीं कर सकते हैं ! वे बौद्ध शिक्षा के 17 विश्व-विद्यालय थे जिसमें से एक के कुलपति मोग्लिपुत्त थे ! Abhinder Gautam तिपिटक में कहाँ लिखा है भाई? महा-काश्यप को यही भय था कि पंडित अपनी विचारधारा को बुद्ध के मुंह से न कहला दें इसीलिए उन्होंने सम्पूर्ण बुद्ध वाणी का संगायन कराकर संकलित कर दिया था! बु...

चमार

Vinod Kumar आपको पता होगा, अंग्रेजो के समय जब बौद्धों की गिनती कराई गयी तो केवल कर्नाटक राज्य में मात्र १८ हजार बौध परिवार मिले थे अन्य किसी राज्य में बौद्ध नही पाये गये ! आज तमाम बौद्ध भिक्षु ब्राह्मण कुल से आते है इनकी धम्म में कोई आस्था नहीं है यह सिर्फ बुद्ध के नाम पर आने वाले दान को प्राप्त करने के लिए चीवर धारण किये हुए हैं इसलिए बाबा साहब ने नव बौद्धों के लिए 22 प्रतिज्ञाएँ दी हैं ! जो 22 प्रतिज्ञाएँ न करे उसे नव भिक्षु न मानें ! पंडित राहुल संक्रत्यान खुद ब्राह्मण कुल से हैं भिक्षु समाज उनको अपना अग्रणीय मानता है किन्तु क्या किसी ने खोज की है कि वे 22 प्रतिज्ञाएँ करते थे? इसीलिए मैंने अपनी एक पोस्ट में कहा है कि मेरा नाम चमार है और मैंने बौद्ध उपाधि धारण की है! आचार्य रजनीश ने अपनी खोज में यह सिद्ध किया है कि चमार मूलतः बौद्ध ही हैं ! Rajesh Achal ज्योतिष में ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र जातक का वर्ण है जोकि उसके गुण को दर्शाता है यह गुण जातक-उर्जा का 12 तारा-मंडल (राशियों) के साथ सम्बंधित है! इसका समज के जाति विभाजन से कोई सम्बन्ध नही है! दलितों और बौद्धों को इस षड्यं...

आत्मा की मृत्यु

आत्मा की मृत्यु भाई मेरे क्यों आत्मा के साथ उलझ रहे हो ? बुद्धिज्म के अनुसार आत्मा (चित्त) विकारो का बंधन है जो एक योनि से दूसरी दूसरी योनि में स्थानांतरित होता रहते है शरीर की निर्जरा हो जाने पर ! किन्तु जब विकारो की निर्जरा हो जाती है तो चित्त/आत्मा नाम की कोई चीज नही रहती है ! विपश्ना साधना वह विधि है जिससे चित्त विकार विमुक्त हो जाता है और आत्मा की ही मृत्यु हो जाती है ! Vinod Kumar मित्र आपका मेरे साथ इस विषय पर जिद्द करना हठधर्मिता है जिसका मेरे पास कोई इलाज नही है! दिल की धडकन और रक्त के बहने की अनुभूति यदि आप नही कर सकते हो, तो आत्मा की अनभूति कैसे करोगे ? अब यह मत कह देना कि आपके शरीर में कोई रक्त नही बहता है और न ही दिल धड़कता है! क्योंकि जड़ मनुष्य की पांच इन्द्रियां न तो दिल के धड़कने की अनुभूति कर पाती है और न ही रक्त के बहने की जबकि इन सब की अनुभूति किसी भी साधक के लिए सामन्य बात है ! Vinod Kumar मित्र "जिन खोजा तिन पयाणा"! अध्यात्मिक (निर्गुण-साधक) लोग ब्रेन का मात्र दर्शन ही नही करते बल्कि उसका भोग करते हैं मित्र उसकी एक-एक शिरा में रमण करते हैं ! आपको किसने...