आत्मा की मृत्यु
आत्मा की मृत्यु
भाई मेरे क्यों आत्मा के साथ उलझ रहे हो ? बुद्धिज्म के अनुसार आत्मा (चित्त) विकारो का बंधन है जो एक योनि से दूसरी दूसरी योनि में स्थानांतरित होता रहते है शरीर की निर्जरा हो जाने पर ! किन्तु जब विकारो की निर्जरा हो जाती है तो चित्त/आत्मा नाम की कोई चीज नही रहती है ! विपश्ना साधना वह विधि है जिससे चित्त विकार विमुक्त हो जाता है और आत्मा की ही मृत्यु हो जाती है !
Vinod Kumar मित्र आपका मेरे साथ इस विषय पर जिद्द करना हठधर्मिता है जिसका मेरे पास कोई इलाज नही है! दिल की धडकन और रक्त के बहने की अनुभूति यदि आप नही कर सकते हो, तो आत्मा की अनभूति कैसे करोगे ? अब यह मत कह देना कि आपके शरीर में कोई रक्त नही बहता है और न ही दिल धड़कता है! क्योंकि जड़ मनुष्य की पांच इन्द्रियां न तो दिल के धड़कने की अनुभूति कर पाती है और न ही रक्त के बहने की जबकि इन सब की अनुभूति किसी भी साधक के लिए सामन्य बात है !
Vinod Kumar मित्र "जिन खोजा तिन पयाणा"! अध्यात्मिक (निर्गुण-साधक) लोग ब्रेन का मात्र दर्शन ही नही करते बल्कि उसका भोग करते हैं मित्र उसकी एक-एक शिरा में रमण करते हैं ! आपको किसने कह दिया की ब्रेन की खोज नही कर पाए ? क्यों मूर्खो से सूनी-सुनायी बातो में उलझते हो? आप कुछ करना नही चाहते केवल वाणी विलास करते हो, मेरी वाणी विलास में कोई रुचि नही है इसलिए मैं किसी भी समय मित्रता का परित्याग कर सकता हूँ !
Vinod Kumar फिर वाणी विलास , यह कोई गुप्त ज्ञान नही है ! सभी, अरहंत, सक्दागामी, अनागामी और स्रोतापन्न को ब्रेन की अनुभूति होती है ! मुझे भी होती है इसलिए इस विषय की चर्चा को विराम दो !
मित्र ब्रेन स्वयं में एक सहायक इन्द्रीय है जो सभी स्मृतियों को रीड करती है ! यहाँ तक कि पूर्व जन्म की स्मृतियों को भी गहन अंधकार में रीड कर लेती है!
इसीलिए बुद्धिज्म में ज्ञान इन्द्रियों की संख्या ५ न कह कर छः कही जाती है ! वैदिक दर्शन के लोग पांच इन्द्रीयो की बात करते हैं !
Vinod Kumar आपका ब्राह्मणों से बैर है इसलिए तिस्स की संगीति को छोड़ दो, सम्राट अशोक के समय जो धम्म-धारण विधि लंका कम्बोडिया थाईलैंड और वर्मा में गया उन लोग ने इसको बार-बार परिशुद्ध किया हैं, क्योकि पाली भाषा की अपनी कोई लिपि नही है, इसलिए यह जहाँ गयी उसी लिपि में लिखी गयी ! उच्चारण की त्रुटी को बार-बार शुद्ध किया गया है ! मेरा लक्ष्य बुद्ध दर्शन को अनुभूति के स्तर पर प्राप्त कर प्रसारित करना है, न कि मात्र चिंतन-मनन के स्तर पर प्रचार-प्रसार करना ! लोगो ने बुद्ध दर्शन में क्या खराब किया है, वह तो चलकर ही पता लगेगा, चिंतन-मनन का ज्ञान तो ब्राह्मणों-पुरोहितो जैसा ही होगा, यह श्रमण परम्परा का ज्ञान नही है !
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