यादवो की मूर्खताएं

​ @Alok Yadav इस तरह से परिभाषित करना ठीक न होगा ! विश्व सुन्दरी, मिस वार्ड, एयर होस्ट्स, होटल सर्विस के आलावा रेड एरिया आदि काल गर्ल में उच्च घरानों की औरते होती हैं! कुछ जन-जातियां जो हारे हुए क्षत्रियों की जंगल में भाग गयी औरते हैं ने कालांतर में देह-व्यापर के धंधे में खुद को संलग्न कर लिया ! कुछ स्त्रियों का शोषण करके राजवाड़ों ने अपने पास रख लिया कालांतर में उनकी संतानों को अलग जाति का नाम दे दिया गया ! वे अस्प्रश्य जातियां नही थी आगे भी उनकी सेवा राजा और रजवाड़े लेते रहे उन सभी से देह व्यापर कराया जाता रहा! उन्ही में से अधिकांश को देव-दासी बनाया जाता था ! अस्प्रश्या जातियां देह व्यापर में नही हैं बल्कि वे जहाँ पर है कमजोर हालत में है जातिगत दुर्भावना से उनका शोषण किया जाता है और बंधुआ मजदूरी कराई जाती है ! यादव जी आप अपने को कृष्णवंशी कहना तो छोड़ दो, क्योकि कृष्ण वंश तो कृष्ण के रहते ही गांधारी के श्राप से समाप्त हो गया था ! आप वे ग्वाला हैं जो राजा और रजवाड़ो ने अपने पशुओं की देखभाल के लिए रखा था ! आप यदु-वंशीय नही हैं झूठे अहंकार में फसकर आरएसएस का भला करोगे और ८५% का नुकसान ! >RSS की तरह आप भी नही सुधरोगे ! वे हिन्दू-हिन्दू चिल्लाते हैं जबकि किसी पौराणिक ग्रन्थ में हिन्दू जैसा कुछ नहीं है ! यह मुस्लिमो के द्वारा तत्कालीन राजाओ को दी गयी गाली है, जो (राजा)समाज को लूटते और शोषण करते थे ! सन १९२५ में हिन्दू महासभा के गठन के बाद हिन्दू शब्द को आत्मसात कर लिया गया तथा सभी गैर-मुस्लिम को हिन्दू नामक गली में पिरो-दिया गया ! इसी प्रकार आप भी यादवो को कृष्ण-वंशी कहने पर तुले हुए हो जबकि वह पूरा वंश गांधारी के श्राप से समाप्त हो चूका है! अध्यात्मिक रूप से भी देखा जाये तो देव-लोक के प्राणी मृतु लोक में क्यों रहेंगे ? वे कृष्ण के साथ आये थे और कृष्ण के साथ ही चले गए ! अब आप जाटो को भी यादव बंश से जोड़ रहे हो, यह कितनी बड़ी मूर्खता है जबकि हर्ष-बर्धन के समय तक जितनी लुटेरी जातियां भारत में आयीं थी ब्राह्मणों ने उनको रक्षा सूत्र देकर और उपनयन संस्कार करके उन्हें राजपूत बना दिया था ताकि वे हर्ष-बर्धन के बौध-साम्राज्य का समूल नाश कर सकें! जाट इन्हीं बाहरी आक्रंताओ में से एक जाति है जिसका उपनैन-संस्कार करके राजपूत बनाया गया तथा ब्राह्मण समाज में जोड़ा गया था ! यादव ब्राह्मण-समाज के नहीं श्रवण-संसकृति (जिसे आजकल मूल-निवासी कहते हैं) से हैं ! आप आरएसएस यूनिवर्सिटी के द्वारा फैलाये गए दुष-प्रेरित ग्रंथो का शिकार हो चुके के हो ! उनकी तो आदत है कृतिम शौर्य पैदा करके जातियों को आपस में लडवा-देना और उसके बाद वे चौधरी बनकर बैठ जाना !

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