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Showing posts from November, 2020
किसान आन्दोलन
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Gaurav Sarwan मित्र आपकी सोच सात्विक है किन्तु शब्दों के अर्थ देश को बहुत बड़ी क्रांति में झोक देंगे! अगर आप अमीरी-गरीवी को ख़त्म करना चाहते हैं तो शेयर-मार्केट में लगी सम्पूर्ण पूँजी को राष्ट्रीय संपत्ति घोषित कर कब्ज़ा करना होगा! जो काम करेगा वही श्रम का सुख भोगेगा, जन्म से कोई लाला नही होगा और ना ही किसी सरकारी अथवा प्राइवेट कंपनी के प्रमुखों का पद जन्म पर आधारित होगा! हर-पद(सरकारी और प्राइवेट) के लिए खुली प्रतियोगिता होगी तथा सबको इच्छित सामान शिक्षा ग्रहण करने का हक़ होगा जिसका सम्पूर्ण खर्च सरकार उठाएगी! हर प्रकार के श्रमिक(अधिकारी-मजदूर व अन्य ) को अनिवार्य शिक्षाकर देना ही होगा! मात्र किसान और श्रमिको के विरोध में कानून बनाकर देश में समानता नहीं लाई जा सकती है! Gaurav Sarwan Kamlesh Kumar Mittra ब्रदर आपने पढ़ने में गलती की है मैंने भारत के बाकी के राज्यों के किसान को गरीब नहीं कहा है मैंने यह कहा है कि बाकी के राज्य के लोगों के पास बड़ी जमीने नहीं है आप बात को अपनी तरफ मोड़ने की कोशिश कर रहे हो और आप चाहते क्या हो भारत में हमेशा असमानता बनी रहे अमीर और ज्यादा अमीर होता ...
निंदा रस से मुक्त
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Vinod Kumar नास्तिकता शब्द आस्तिकता का विरोधी है, विरोध विजय की ओर ले जाता है! ज्ञान की ओर जाने वाले लोग आर्य-सत्य को जान लेने में रूचि रखते हैं वे आस्तिकता और नास्तिकता के बीच से सार को जान लेते हैं! बुद्ध के बताये ब्रह्म-बिहार में रमण करते हैं वे न तो नास्तिको को और न ही आस्तिको को श्रधा अथवा घ्रणा से देखते हैं! मैत्री करुणा मुदिता और उपेखा में रमण करता हुआ व्यक्ति ही आर्य-सत्य से बोधिगाम्य हुआ होता है वह न तो आस्तिक होता है और न ही नास्तिक होता है! नास्तिक शब्द पर मैं कोई नया लेपन करना नही चाहता क्योकि उससे मात्र वाणी विलास उत्पन्न होगा! कालांतर में शब्द सदैव अपना अर्थ बदलते रहते हैं कहने वाला सदैव समसामयिक अर्थो में उसका प्रयोग करता है और उसे उसी अर्थ में समझा भी जाता है! सामान्य जन शब्द विन्यास में नही पड़ता समसामयिक अर्थ स्वीकार करके बात को स्वीकार-अस्वीकार या प्रेम और निंदा करता है! मूल लेख में मुझे ऐसा लगा वैसा मैंने लिख दिया! Gyan Prakash Verma सनातन धर्म में न दया है न करुणा ! सनातन धर्म मनुस्मृति को मानता है! मनु स्मृति में दंड के अमानवीय प्राविधान हैं जबकि आज की दंड विध...
मन्त्र
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मित्र, जितेन्द्र यह पूरी तरह वैज्ञानिक प्रक्रिया है और करना अत्यंत कठिन है! सरल होता तो मई ही कर देता! ध्यान से सुने - जब किसी एक शब्द का लगातार उच्चारण किया जाता है तो कंठ और सिर में उस तरह की रसायनिक प्रक्रिया आरम्भ हो जाती है अत्यधिक समय तक करते रहने से, मैग्नेटिक वेव बनने लगती है जिस कारण अडोस-पड़ोस के लोगो के सिर में भी तरंगे उत्पन्न होने लगती है और अन्य लोग भी उसी शब्द का उच्चारण स्वतः करने लगते हैं! इससे एक शब्द में आस्था रखने बालो का संगठन मजबूत हो जाता है! जय श्रीराम, ॐ आदि इसके प्रत्यक्ष उधारण हैं! एक शब्द पर एकत्र हुए लोगो से उस पर कार्य करना आरम्भ कर देते हैं!