निंदा रस से मुक्त

Vinod Kumar नास्तिकता शब्द आस्तिकता का विरोधी है, विरोध विजय की ओर ले जाता है! ज्ञान की ओर जाने वाले लोग आर्य-सत्य को जान लेने में रूचि रखते हैं वे आस्तिकता और नास्तिकता के बीच से सार को जान लेते हैं! बुद्ध के बताये ब्रह्म-बिहार में रमण करते हैं वे न तो नास्तिको को और न ही आस्तिको को श्रधा अथवा घ्रणा से देखते हैं! मैत्री करुणा मुदिता और उपेखा में रमण करता हुआ व्यक्ति ही आर्य-सत्य से बोधिगाम्य हुआ होता है वह न तो आस्तिक होता है और न ही नास्तिक होता है! नास्तिक शब्द पर मैं कोई नया लेपन करना नही चाहता क्योकि उससे मात्र वाणी विलास उत्पन्न होगा! कालांतर में शब्द सदैव अपना अर्थ बदलते रहते हैं कहने वाला सदैव समसामयिक अर्थो में उसका प्रयोग करता है और उसे उसी अर्थ में समझा भी जाता है! सामान्य जन शब्द विन्यास में नही पड़ता समसामयिक अर्थ स्वीकार करके बात को स्वीकार-अस्वीकार या प्रेम और निंदा करता है! मूल लेख में मुझे ऐसा लगा वैसा मैंने लिख दिया! Gyan Prakash Verma सनातन धर्म में न दया है न करुणा ! सनातन धर्म मनुस्मृति को मानता है! मनु स्मृति में दंड के अमानवीय प्राविधान हैं जबकि आज की दंड विधि में दंड के अमानवीय प्राविधान नही है इस आधार पर कहा जा सकता है कि सनातन धर्म दया करुणा और प्रेम से रहित है! सनातन धर्म के सभी देवी-देवता शस्त्रधारी हैं इससे प्रतीत होता है सनातन धर्म अत्यंत ही हिंसक और कुरुर धर्म है! इस सत्य को न स्वीकार करना और स्वयं को प्रेम करुणा और दया का प्रतीक बताना एक नई तरह की धूर्त है! सभ्य मानवी समाज में संतान धर्म सिर्फ नफरत करने योग्य है इसमें कोई वैज्ञानिकता नहीं है! मित्र वे मधु-मखियाँ हैं और उनके आर्थिक हित जुड़े हैं इसलिए वे संगठित है! अन्य जानवरों के आर्थिक हित नही जुड़े होते हैं इसलिए वे पत्थर मारने से भाग जाते हैं शत्रु पर आक्रमण नही करते रहते है जबकि मधु-मखियाँ हमला कर देती हैं! सवर्ण और वैश्य समाज आर्थिक हितो के कारण एक दुसरे से मजबूती से जुड़ा है और संख्या में कम होने के बाद भी आक्रामक रहता है! दलित और पिछड़े जब तक आर्थिक हित से नही जुडेगे कोई संगठन स्थापित नहीं होगा! किताबी बातो का असर इसीलिए नही होता है क्योंकि उनमें गहराई नही होती! क्या समझे मित्र ?

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