मृत्यु असंभव है .............

तुम अभी मर भी न पाओगे ............... इन्सान दो तत्वो से मिलकर बना है! बुद्ध दर्शन में इसे नाम-रूप कहा जाता है और वैदिक दर्शन में इसको शारीर और आत्मा कहा जाता है! शरीर (बुद्ध दर्शन के अनुसार रूप) का पुनः पुनः परिवर्तन होता है, आत्मा (बुद्ध दर्शन के अनुसार नाम) के लिये! तबतक-जबतक "आत्मा" अथवा "नाम" का निर्वाण नहीं हो जाता है शरीर मरकर भी नही मर पता है! वैदिक दर्शन कहता है आत्मा ब्रह्म में विलीन हो जाती है (अर्थात मुक्त हो जाती है) जबकि बौद्ध दर्शन कहता नाम का निर्वाण हो जाता है (अर्थात प्रकृति में विलीन हो जाना खो जाना) ! वैदिक दर्शन जिसे ब्रह्म कहता है बौद्ध दर्शन उसको प्रकृति कहता है! बिना मरे स्वर्ग नही मिलाता, जिन व्यक्तियों ने कभी अपने दिल की धड़कन न सुनी हो, उनको डाक्टर ही बताता हो कि तुमारा दिल धड़क रहा है तुम अभी जिन्दा हो! ऐसे लोगो को क्या अपने शरीर के अन्दर आत्मा की अनुभूति हो पायेगी यह एक प्रश्न चिन्ह है? धम्म में बुद्ध का मात्र इतना ही योगदान है कि उन्होंने वह विधि पुनः खोज निकाली जिससे कोई भी इच्छुक व्यक्ति अपने अन्दर विद्यमान आत्मा का साक्षात्कार कर सकता है और उसको परिशुद्ध कर सकता है तथा ब्रह्मांडीय ग्रहों का उसकी आत्मा (नाम) पर पड़ने वाले प्रभाव को रोक सकता है बदल सकता है! यह स्वयं की ध्यान-साधना से ही संभव है कोई व्यक्ति किसी अन्य को मुक्त नही कर सकता है अर्थात दूसरो के लिए किये जाने वाले पूजा-पाठऔर पाखंड व्यर्थ हैं!

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