प्रतिवाद

भगवान् बुद्ध की खोज मात्र इतनी है कि व्यक्ति को चित्त का दर्शन कैसे कराया जाये और इस कार्य में वे सफल भी हुए ! मित्र अगर भगवान बुद्ध का जोर सामाजिक मान्यताओ का गठन करना होता तो वे अपने मृत्यु संस्कार के बाद की परिस्थितियों के निदान के लिए एक ब्राह्मण पर छोड़ने का आनद को निर्देश न देते ! उनकी अस्थियो को आठ कलश में भर कर राजाओ को बाँट देने का कार्य तो एक ब्राह्मण ने ही किया था ! होली का विकृत रूप निंदनीय है परन्तु पहले यह तो जानो कि विकृति किसको कहा जाये ? जो किसी एक की मान्यता के अनुरूप नही है मात्र इस कारण से तो उसको निंदनीय नही कहा जा सकता है! बुद्ध दर्शन में चित्त विशुद्दी का अद्भुत ज्ञान संकलित है उस पर चर्चा कर धारण किया जाये तो कल्याणकरी ही होगा ! प्रतिवाद की खोज समय की वर्वादी है !

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