सोतापन्न, सकृदागामी, अनागामी और अर्हत अवस्था क्या हैं? ☸️ 🙏 ☸️ 🙏 ☸️ 🙏 ☸️ 🙏 ☸️ 🙏 ☸️ 🙏 ☸️ 🙏 ☸️ भाग ...【2】 🌺 सकृदागामी अवस्था 🌺 _____________________ वह अरिय सावक ( श्रेष्ट श्रावक/शिष्य )जो अब केवल पुण्य कर्म ही करता है। जिसके तीन बन्धन (=संयोजन ) सत्काय दृष्टि (आत्म/स्व/मैं,मेरा नित्य है) , विचिकिच्छा (=सभी सन्देह) और शीलव्रत परामर्श (=शील और व्रत को ही सब कुछ मानना) नष्ट हो जाते हैं और जो राग, द्वेष और मोह को इतना दुर्बल कर देता है कि पुनः उतपन्न नही हो पाते हैं। यदि उतपन्न हो भी जायें तो तीक्ष्ण नहीं होते। ऐसा अरिय श्रावक केवल एक ही बार लोक में आकर दुःखो का अंत कर निर्वाण पा लेता है। तीनो संयोजनो के क्षीण होने पर राग (=और चाहिये की भावना), द्वेष (=अप्रिय अनुभूति नही चाहिए की भावना ), मोह ( चाहत,जुड़ाव ) के निर्बल (=तनु) पड़ने पर, सकृदागामी ‘होता है, एक ही बार (=सकृद् एव) इस लोक मे फिर आ (=जन्म) कर, दुख का अन्त करता (=निर्वाण-प्राप्त होता) हे । यह भी महालि ...धर्म है ० । -(महाली सुत्त ,दिर्घ निकाय) श्रावस्ती में भगवान बुद्ध ने कहा - मोहं भिक्खवे,...