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Showing posts from April, 2020

मानव विकास

मानव विकास 

हेला

केवल दो वक्त की रोटियों के लिए भरी बरसात में मैले की टोकरी का सारा मैला सर पर उठाना यह एक ऐसी विवशता है, जो किसी भी संवेदनशील मनुष्य को परेशान कर सकती है। लेकिन कैसा हमारा शिक्षित, सहिष्णु समाज और कैसे कथित तौर पर पढ़े लिखे लोग और नकारा सरकारी तंत्र और विशेषकर कलेक्टरों की जमात है, जिनकी आंखों को कुछ नहीं दिखाई देता।  एक कलेक्टर ने कहा कि हम बरसात में पीतल की मटकी इनको उपलब्ध करवाएंगे, ताकि मैला ढोने में परेशानी नहीं हो। हेला का जीवन 

चमार मूलत बौद्ध है-ओशो

चमार मूलत बौद्ध है-ओशो यह जान कर तुम हैरान होओगे कि चमार मूलत: बौद्ध हैं! जब भारत से बौद्ध धर्म उखाड़ डाला गया और बौद्ध भिक्षुओं को जिंदा जलाया गया और बौद्ध दार्शनिकों को खदेड़ कर देश के बाहर कर दिया गया, तो एक लिहाज से तो यह अच्छा हुआ। क्योंकि इसी कारण पूरा एशिया बौद्ध हुआ। कभी—कभी दुर्भाग्य में भी सौभाग्य छिपा होता है। जैन नहीं फैल सके क्योंकि जैनों ने समझौते कर लिए। बच गए, लेकिन क्या बचना! आज कुल तीस— पैंतीस लाख की संख्या है। पांच हजार साल के इतिहास में तीस—पैंतीस लाख की संख्या कोई संख्या होती है! बच तो गए, किसी तरह अपने को बचा लिया, मगर बचाने में सब गंवा दिया। बौद्धों ने समझौता नहीं किया, उखड़ गए। टूट गए, मगर झुके नहीं। और उसका फायदा हुआ। फायदा यह हुआ कि सारा एशिया बौद्ध हो गया। क्योंकि जहां भी बौद्ध— दार्शनिक और मनीषी गए, वहीं उनकी प्रकाश —किरणें फैलीं, वहीं उनका रस बहा, वहीं लोग तृप्त हुए। चीन, कोरिया…… दूर—दूर तक बौद्ध धर्म फैलता चला गया। इसका श्रेय हिंदू पंडितों को है। जो भाग सकते थे भाग गए। भागने के लिए सुविधा चाहिए, धन चाहिए। जो नहीं भाग सकते थे— इतने दीन थे, इतने दरिद्र थे— वे...

चमार

चमार भारतीय उपमहाद्वीप में पाई जाने वाली "जाति समूह" है। यह जाति अस्पृश्यता की कुप्रथा का शिकार भी रही है। इस जाति के लोग परंपरागत रूप से चमड़े के व्यवसाय से जुड़े रहे हैं। चमार इस दुनिया में सभी लोग हैं क्योंकि चमार का अर्थ होता है च=चमड़ा , म=मांस , र=रक्त इन तीनों से मिलकर एक इंसान बनता है उसे ही चमार कहते हैं हैं चमार जाति को अलग-अलग क्षेत्रों में अन्य कुछ नामो से भी जाना जाता हैं। 1.चमार – भारत के सभी राज्यों में। 2.चांभार/चर्मकार – मुख्यतः महाराष्ट्र में। 3.chamar – मुख्यतः दिल्ली, हरियाणा और उत्तर प्रदेेेश (आगरा के आस-पास के क्षेत्रों में) में। ४. जातव-‌कृृषक ५ . जटिया ६ .रोहित/रोहितास – मुख्यतः गुजरात में। ७ .रविदासी/रविदासिया/रैदासी (हिन्दू/सिक्ख) – मुख्यतः पश्चिमी उत्तर प्रदेश और पंजाब में। ८. रामदासी/रामदासिया ९.अहिरवार राजस्थान्में चमार समाज को रैगर व चमार नाम से जानते हैं यहा राजनीतिक में चमार समाज में पूर्व में राजस्थान मंत्री उपाध्यक्ष अनुसूचित जाति आयोग से माननीय विकेश जी खोलिया मंत्री थें अजमेर जिले से बहन वंदना जी नोगिया जिला प्रमु...

सोतापन्न, सकृदागामी, अनागामी और अर्हत अवस्था क्या हैं?

सोतापन्न, सकृदागामी, अनागामी और अर्हत अवस्था क्या हैं? ☸️ 🙏 ☸️ 🙏 ☸️ 🙏 ☸️ 🙏 ☸️ 🙏 ☸️ 🙏 ☸️ 🙏 ☸️ भाग ...【2】 🌺  सकृदागामी अवस्था  🌺 _____________________ वह अरिय सावक ( श्रेष्ट श्रावक/शिष्य )जो अब केवल पुण्य कर्म ही करता है। जिसके तीन बन्धन (=संयोजन ) सत्काय दृष्टि (आत्म/स्व/मैं,मेरा नित्य है) , विचिकिच्छा (=सभी सन्देह) और शीलव्रत परामर्श (=शील और व्रत को ही सब कुछ मानना) नष्ट हो जाते हैं और जो राग, द्वेष और मोह को इतना दुर्बल कर देता है कि पुनः उतपन्न नही हो पाते हैं। यदि उतपन्न हो भी जायें तो तीक्ष्ण नहीं होते। ऐसा अरिय श्रावक केवल एक ही बार लोक में आकर दुःखो का अंत कर निर्वाण पा लेता है। तीनो संयोजनो के क्षीण होने पर राग (=और चाहिये की भावना), द्वेष (=अप्रिय अनुभूति नही चाहिए की भावना ), मोह ( चाहत,जुड़ाव ) के निर्बल (=तनु) पड़ने पर, सकृदागामी ‘होता है, एक ही बार (=सकृद् एव) इस लोक मे फिर आ (=जन्म) कर, दुख का अन्त करता (=निर्वाण-प्राप्त होता) हे । यह भी महालि ...धर्म है ० । -(महाली सुत्त ,दिर्घ निकाय) श्रावस्ती में भगवान बुद्ध ने कहा - मोहं भिक्खवे,...

षड्यंत्र

जी इस समय भारत में बहुत विचित्र परिस्थति है ! यह लोग ऐसे हालत पैदा कर देना चाहते हैं कि चुनाव प्रणाली ख़त्म हो जाये इसलिए यह ऐसे देशो से उलझ रहे हैं जहाँ राजतंत्र है यह उनकी रणनीति का अंग है !

महाराष्ट्र के पालघर में हुई लिंचिंग पर गौरने करकी जरूरत है..

——- 1. किसी भी सत्ताधारी पार्टी (शिवसेना, कांग्रेस) ने हत्यारों को मालाएं नहीं पहनाईं जैसे कि हर लिंचिंग के बाद भाजपा नेता पहनाते हैं। जैसे कि याद हो तो भाजपा के केंद्रीय मंत्री जयंत सिन्हा ने पहनाई थीं। 2. अगली सुबह ही 110 लोगों को जेल भेज दिया गया। तुरंत कठोर कार्यवाही की बात भी महाराष्ट्र सरकार द्वारा कही गई। जबकि लिंचिंग में मुसलमान मारा जाता है तो संघ-भाजपा नेताओं द्वारा हत्यारों को इनाम स्वरूप टिकट दी जाती हैं। लिंचिंग के प्रति भाजपा सरकार का क्या रुख रहता है किसी से छुपा हुआ नहीं है। 3.किसी नेता ने हत्यारों के समर्थन में भाषण नहीं दिया। जैसे कि दादरी मामले में भाजपा विधायकों-सांसदों द्वारा दिए गए जाते रहे थे। 4. मृतकों के परिजनों पर FIR दर्ज नहीं की गई जैसे कि योगी द्वारा अखलाक के परिवारीजनों पर की गई थी। 5. हत्यारों के समर्थन में फंड रेजिंग नहीं की गई, किसी एक ने भी हत्यारों के समर्थन में पैसे नहीं मांगे। जैसे कि शंभु रैगर जैसे हत्यारे के समर्थन में आरएसएस के लोगों द्वारा फंड रेजिंग की गई थी। 6. हत्यारों की फ़ोटो को फेसबुक व्हाट्सएप की डीपी पर नहीं लगाया ...

Kunal ko javav

भाई सब आप लोगो की सांगत की कृपा से है, इसीलिए हम अपने सहपाठियों को पहचान लेते हैं, बस अब कर्म क्षेत्र अलग अलग हैं आप राज भक्त हो गए हो और हम देश भक्त! आप हिन्दुस्तान के लिए संघर्षरत हो और हम भारत में मौज कर रहें है.! हमारे देश भारत में अक्सर पाकिस्तानियों के भूत और हिनुस्तानियो के भूत में झगडे हो जाते हैं उससे कभी कभी मन विचलित हो जाता है! कोरोना संकट की बजह से लॉक डाउन है इसलिए आपकी अच्छे से बजा रहें है कौन जाने कल हम रहे न रहे ? मेरा बजाना तुम्हें कल बहुत याद आयेगा ! मित्र इतिहासकार और साहित्यकार में अंतर करना सीखो - साहित्यकार कभी भी इतिहासकार नहीं होता कालखंड के अनुसार ! भक्तो की दुविधा यह है कि वे दोनों को एक ही समझते हैं . मित्र थोडा लिखा है पूरा समझ लेना ....

सत्ता की भूख

समाजवादी नेता राममनोहर लोहिया ने अपनी किताब 'गिल्टी मेन ऑफ़ पार्टिशन' में लिखा है कि कई बड़े कांग्रेसी नेता जिनमें नेहरू भी शामिल थे वे सत्ता के भूखे थे जिनकी वजह से बँटवारा हुआ. नामी-गिरामी इतिहासकार बिपन चंद्रा ने विभाजन के लिए मुसलमानों की सांप्रदायिकता को ज़िम्मेदार ठहराया है जबकि कुछ इतिहासकारों का कहना है कि 1937 के बाद कांग्रेस मुसलमान जनमानस को अपने साथ लेकर चलने में नाकाम रही इसलिए विभाजन हुआ. कई इतिहासकारों का मानना है कि 1946 के बाद जब सांप्रदायिक हिंसा नियंत्रण से  बाहर हो गई तो विभाजन के अलावा कोई विकल्प नहीं रह गया. इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि अँगरेज़ी हुकूमत ने भी स्थिति को बद से बदतर बनाया, माउंटबेटन और रेडक्लिफ़ ने बँटवारे के मामले में बहुत जल्दबाज़ी दिखाई, पहले भारत की आज़ादी के लिए जून 1948 तय किया गया था, माउंटबेटन ने इसे खिसका कर अगस्त 1947 कर दिया गया जिससे भारी अफ़रा-तफ़री फैली और असंख्य लोगों की जानें गईं. Video caption 70 साल पहले एक शख्स को एक मुल्क के बंटवारे की जिम्मेदारी दी गई थी. कुल मिलाकर, बँटवारा एक ऐसा मामला है जिसमें सब लोग...

विभाजन

इतिहासकार उमा कौरा ने लिखा है कि विभाजन की रेखा तब गहरी हो गई जब 1929 में मोतीलाल नेहरू कमेटी की सिफ़ारिशों को हिंदू महासभा ने मानने से इनकार कर दिया. मोतीलाल नेहरू कमेटी ने अन्य बातों के अलावा इस बात की भी सिफ़ारिश की थी कि सेंट्रल एसेम्बली में मुसलमानों के लिए 33 प्रतिशत सीटें आरक्षित हों. आयशा जलाल ने लिखा है कि 1938 आते-आते जिन्ना मुसलमानों के 'अकेले प्रवक्ता' बन गए क्योंकि वे ही उनकी माँगों को ज़ोरदार तरीक़े से उठा रहे थे. दूसरी ओर, इतिहासकार चारू गुप्ता ने लिखा है, "कां ग्रेस के भीतर के हिंदूवादी और हिंदू महासभा के नेता जिस तरह 'भारत माता, मातृभाषा और गौमाता' के नारे लगा रहे थे उससे बहुसंख्यक वर्चस्व का माहौल बन रहा था" जिसमें मुसलमानों का ख़ुद को असुरक्षित समझना अस्वाभाविक नहीं था. ये भी ग़ौर करने की बात है कि 1932 में गांधी-आंबेडकर के पुणे पैक्ट के बाद जब 'हरिजनों' के लिए सीटें आरक्षित हुईं तो सर्वणों और मुसलमानों, दोनों में बेचैनी बढ़ी कि उनका दबदबा कम हो जाएगा. Image copyright GETTY IMAGES जिन्ना बंगाल विभाजन ने डाली नींव इतिहासकार...

जज़िया

जज़िया ( Jizya or Jizyah ) एक प्रकार का धार्मिक कर है। इसे मुस्लिम राज्य में रहने वाली गैर मुस्लिम जनता से बसूल किया जाता है। क्योंकि इस्लामिक राज्य में सिर्फ मुस्लिमों को ही रहने की इजाजत थी यदि इस धर्म के सिवाय कोई और रहेगा तो उसे धार्मिक कर देना होगा। इसे देने के बाद गैर मुस्लिम लोग इस्लामिक राज्य में अपने धर्म का पालन कर सकते थे। ऐसा नहीं है कि मुस्लिमों ने ही गैर मुस्लिमों से इस प्रकार का धार्मिक कर बसूला। गहड़वालों ने भी अपने राज्य में तुरुष्कदण्ड नामक एक कर लगाया। जोकि  उनके राज्य में रहने वाले मुस्लिमों पर लगाया गया था। भारत में इसका प्रथम साक्ष्य मुहम्मद बिन कासिम के आक्रमण के बाद देखने को मिलता है। सर्वप्रथम मुहम्मद बिन कासिम ने ही भारत में सिंध प्रांत के देवल में जजिया कर लगाया। इसके बाद जजिया कर लगाने वाला दिल्ली सल्तनत का प्रथम सुल्तान फिरोज तुगलक था। इसने जजिया को खराज (भूराजस्व) से निकालकर पृथक कर के रूप में बसूला। इससे पूर्व ब्राह्मणों को इस कर से मुक्त रखा गया था। यह पहला सुल्तान था जिसने ब्राह्मणों पर भी जजिया कर लगा दिया। फिरोज तुगलक के ऐसा करने के विरोध...

आरएसएस को समझो भाग-२

१ संग्राहको में मीडिया घराने , पत्रकार और आरएसएस जैसे तमाम संगठन (सामाजिक , धर्मिक , राजनीतिक , व्यावसायिक) फल-फूल रहे हैं बदनाम केवल आरएसएस हुआ है ! २ संग्राहक मृत ब्राह्मणवाद की वह श्रंखला है जो पुनः अपने स्थापन के लिए संघर्षरत है! ३ किसी भी संग्राहक के विचार को जब आप सोशल मीडीया की साइड पर तलाशोगे तो पाओगे मूल विचार किसी और ने स्थापित किया था और मर गया. ४ कुछ विचारो की तलाश के लिए आपको ५० साल पुरानी पुस्तकें तलाशनी होंगी जो कहती कुछ और हैं किन्तु संग्राहक प्रसारित कुछ और कर रहे हैं ! ५ विचारक वे हंस हैं जिनके कदमो के निशान तक नहीं मिलते , यह तो संग्राहक हैं जो उनका पुतला लिए घूमते रहते हैं !

आरएसएस को समझे !

१ विचारक , संग्राहक , प्रचारक , प्रशासक(भक्त) और सक्रीय समर्थक , निष्क्रिय समर्थक तथा अवसरवादी समर्थक , यह है आरएसएस का संगठन ! २ आरएसएस के विचारक बहुत वुद्धिजिवी होते हैं किन्तु वे संगठन में नहीं दिखाई देते , संग्राहक ही उनके विचारो दोहन करते हैं जो दिखते हैं! ३ संग्राहको की पहली श्रंखला विचारक के रूप में आरएसएस की पहली पंगति में दिखती है , यह मंद-बुद्धि के भीरु लोग कुतर्क में निपूर्ण हैं! ४ प्रचारक मंद-बुद्धि के संगाह्को की दूसरी श्रेणी है कुतर्क की परख न होने के कारण यह संग्राहको की वाणी ब्रह्मवाणी मान कर प्रचार करते हैं! ५ प्रचारको के लिए ज्ञान का एक मात्र श्रोत संग्राहक ही होते हैं जिनसे यह आजीविका भी पाते हैं ६ प्रशासक: प्रचारको के बाद अगली श्रंखला है जो "भक्त" के नाम से भी जानी जाती है- यह जुबान खोर , लतखोर और लट्ठेत होते हैं ७ प्रचारको द्वारा भक्तो की एक बहुत बड़ी श्रंखला तैयार कर दी गयी है कई भक्त इतने उग्र हो गये है कि इन्होने अपने अलग संगठन बना लिये हैं! ८ अवसरवादी राजनीतिक संगठनों द्वारा संग्रहको को फंडिंग की जाती है- संग्राहक इस फंडिग का पयोग प्रच...