चमार

चमार भारतीय उपमहाद्वीप में पाई जाने वाली "जाति समूह" है। यह जाति अस्पृश्यता की कुप्रथा का शिकार भी रही है। इस जाति के लोग परंपरागत रूप से चमड़े के व्यवसाय से जुड़े रहे हैं। चमार इस दुनिया में सभी लोग हैं क्योंकि चमार का अर्थ होता है च=चमड़ा , म=मांस , र=रक्त इन तीनों से मिलकर एक इंसान बनता है उसे ही चमार कहते हैं हैं
चमार जाति को अलग-अलग क्षेत्रों में अन्य कुछ नामो से भी जाना जाता हैं।
1.चमार – भारत के सभी राज्यों में।
2.चांभार/चर्मकार – मुख्यतः महाराष्ट्र में।
3.chamar – मुख्यतः दिल्ली, हरियाणा और उत्तर प्रदेेेश (आगरा के आस-पास के क्षेत्रों में) में।
४. जातव-‌कृृषक
५ . जटिया
६ .रोहित/रोहितास – मुख्यतः गुजरात में।
७ .रविदासी/रविदासिया/रैदासी (हिन्दू/सिक्ख) – मुख्यतः पश्चिमी उत्तर प्रदेश और पंजाब में।
८. रामदासी/रामदासिया
९.अहिरवार राजस्थान्में चमार समाज को रैगर व चमार नाम से जानते हैं यहा राजनीतिक में चमार समाज में पूर्व में राजस्थान मंत्री उपाध्यक्ष अनुसूचित जाति आयोग से माननीय विकेश जी खोलिया मंत्री थें अजमेर जिले से बहन वंदना जी नोगिया जिला प्रमुख थी पूर्व में एक विधायक केन्हयालाल सुनारिवाल कोन्ग्रेस पार्टी से विधायक तारा बेनिवाल व वर्तमान में गंगा देवी वर्मा ( रेगर) चमार समाज
१०. गौतम उत्तर प्रदेश मे चमार भाई गौतम सरनेम प्रयोग करतें हैं यह अपने आप को कुछ अन्य चमार कि अपेक्षा खुद कोत्र सर्वश्रेष्ठ समझते हैं इनकी संख्या उत्तर प्रदेश में पाई जाती है ।

मध्य काल में चमार एक अपवित्र जाति के रूप में माने जाते थे। सामान्यत: उनका निवास बौद्ध जाति के गाँवों में होता है।सिकन्दर लोदी (1489-1517) के शासनकाल से पहले पूरे भारतीय इतिहास में 'चमार' नाम की किसी जाति का उल्लेख नहीं मिलता | आज जिन्हें हम चमार जाति से संबोधित करते हैं और जिनके साथ छूआछूत का व्यवहार करते हैं, दरअसल वह वीर चंवर वंश के क्षत्रिय हैं | जिन्हें सिकन्दर लोदी ने चमार घोषित करके अपमानित करने की चेष्टा की | भारत के सबसे विश्वसनीय इतिहास लेखकों में से एक विद्वान कर्नल टाड को माना जाता है जिन्होनें अपनी पुस्तक द हिस्ट्री आफ राजस्थान में चंवर वंश के बारे में विस्तार से लिखा है | प्रख्यात लेखक डॅा विजय सोनकर शास्त्री ने भी गहन शोध के बाद इनके स्वर्णिम अतीत को विस्तार से बताने वाली पुस्तक हिन्दू चर्ममारी जाति एक स्वर्णिम गौरवशाली राजवंशीय इतिहास" लिखी | महाभारत के अनुशासन पर्व में भी इस राजवंश का उल्लेख है | डॉ शास्त्री के अनुसार प्राचीनकाल में न तो चमार कोई शब्द था और न ही इस नाम की कोई जाति ही थी | अर्वनाइजेशन' की लेखिका डॉ हमीदा खातून लिखती हैं मध्यकालीन इस्लामी शासन से पूर्व भारत में चर्म एवं सफाई कर्म के लिए किसी विशेष जाति का एक भी उल्लेख नहीं मिलता है | हिंदू चमड़े को निषिद्ध व हेय समझते थे | लेकिन भारत में मुस्लिम शासकों के आने के बाद इसके उत्पादन के भारी प्रयास किए गये थे | डॅा विजय सोनकर शास्त्री के अनुसार तुर्क आक्रमणकारियों के काल में चंवर राजवंश का शासन भारत के पश्चिमी भाग में था और इसके प्रतापी राजा चंवरसेन थे | राणा सांगा व उनकी पत्नी झाली रानी ने चंवरवंश से संबंध रखने वाले संत रैदासजी को अपना गुरु बनाकर उनको मेवाड़ के राजगुरु की उपाधि दी थी और उनसे चित्तौड़ के किले में रहने की प्रार्थना की थी | संत रविदास चित्तौड़ किले में कई महीने रहे थे | उनके महान व्यक्तित्व एवं उपदेशों से प्रभावित होकर बड़ी संख्या में लोगों ने उन्हें गुरू माना और उनके अनुयायी बने | उसी का परिणाम है आज भी विशेषकर पश्चिम भारत में बड़ी संख्या में रविदासी हैं | राजस्थान में चमार जाति का बर्ताव आज भी लगभग राजपूतों जैसा ही है | औरतें लम्बा घूंघट रखती हैं आदमी ज़्यादातर मूंछे और पगड़ी रखते हैं | संत रविदास की प्रसिद्धी इतनी बढ़ने लगी कि इस्लामिक शासन घबड़ा गया सिकन्दर लोदी ने मुल्ला सदना फकीर को संत रविदास को मुसलमान बनाने के लिए भेजा वह जानता था की यदि रविदास इस्लाम स्वीकार लेते हैं तो भारत में बहुत बड़ी संख्या में इस्लाम मतावलंबी हो जायेगे लेकिन उसकी सोच धरी की धरी रह गयी स्वयं मुल्ला सदना फकीर शास्त्रार्थ में पराजित हो कोई उत्तर न दे सका और उनकी भक्ति से प्रभावित होकर अपना नाम रामदास रखकर उनका भक्त वैष्णव (हिन्दू) हो गया | दोनों संत मिलकर हिन्दू धर्म के प्रचार में लग गए जिसके फलस्वरूप सिकंदर लोदी आगबबूला हो उठा एवं उसने संत रैदास को कैद कर लिया और इनके अनुयायियों को चमार यानी अछूत चंडाल घोषित कर दिया | उनसे कारावास में खाल खिचवाने, खाल-चमड़ा पीटने, जूती बनाने इत्यादि काम जबरदस्ती कराया गया उन्हें मुसलमान बनाने के लिए बहुत शारीरिक कष्ट दिए | प्रत्येक बस्ती का एक मुखिया (प्रधान) होता है और बड़े शहरों में प्रधान की अध्यक्षता में ऐसे एक से अधिक समुदाय होते हैं। आज भी कई लोग चमड़े के व्यापार व अन्य परंपरागत व्यवसाय कराते हैं और बहुत से लोग खेतिहर मजदूर हैं। इस जाति को भारतीय संविधान द्वारा अनुसूचित जाति की श्रेणी में रखा गया है। [1] पूर्वी राजस्थान में और मध्य प्रदेश हरियाणा दिल्ली चमार जाति की कुछ उप जातियों को व्यवसायिक और जमींदारों के रूप में देखा गया है इनमें से कुछ जातियां पहले से ही संघर्षशील और आत्मसम्मान के लिए लड़ने वाली थी जिन्होंने मध्य काल से ही सामाजिक सम्मान के लिए संघर्ष जारी रखा और अपना कार्य चमड़े के साथ-साथ जमीनों की पकड़ भी मजबूत रखें।

इस जाति के लोग सामाजिक होते हैं। अस्पृश्यता या छुआ छुत नहीं मानते हैं और अपने धार्मिक अनुष्ठान स्वयं भी करते हैं, इस जाति में विधवा को उसी उपजाति के किसी विधुर से पुनर्विवाह की अनुमति है। इस जाति का एक बड़ा हिस्सा भगवान गौतम बुद्ध और सन्त रविदास की शिक्षा का पालन करता है और उनका उद्देश्य अपनी सामाजिक स्थिति को ऊपर उठाने के लिए अपने रीति-रिवाजों का शुद्धिकरण करना है। इनके रीति-रिवाजों में प्रेम भाव और भाईचारा पाया जाता है जिसमें पूरा गांव और समाज मिलकर त्योहारों और मांगलिक कार्यों को पूरा करते हैं इनमें बहन बेटियों पर बेटों की तरह लाड़ दुलार कर ससुराल में खर्चे किए जाते हैं जो अन्य जातियों में नहीं होते यह जितने मेहनती होते हैं उसमें से आधा पैसा रीति-रिवाजों में खर्च कर देते हैं वैसे आप धीरे-धीरे सुधार हो रहा है इसमें रूढ़ीवादी रीति-रिवाजों को छोड़ा जा रहा है।

इनकी जनसँखया पूरे भारत में 22-23 करोड है 2001 की जनगणना के अनुसार, उत्तर प्रदेश में चमारों की लगभग 16 प्रतिशत आबादी शामिल है।[2] पंजाब में 14% और हरियाणा में लगभग 12% जनसंख्या में चमार हैं।[


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