सत्ता की भूख

समाजवादी नेता राममनोहर लोहिया ने अपनी किताब 'गिल्टी मेन ऑफ़ पार्टिशन' में लिखा है कि कई बड़े कांग्रेसी नेता जिनमें नेहरू भी शामिल थे वे सत्ता के भूखे थे जिनकी वजह से बँटवारा हुआ.
नामी-गिरामी इतिहासकार बिपन चंद्रा ने विभाजन के लिए मुसलमानों की सांप्रदायिकता को ज़िम्मेदार ठहराया है जबकि कुछ इतिहासकारों का कहना है कि 1937 के बाद कांग्रेस मुसलमान जनमानस को अपने साथ लेकर चलने में नाकाम रही इसलिए विभाजन हुआ.
कई इतिहासकारों का मानना है कि 1946 के बाद जब सांप्रदायिक हिंसा नियंत्रण से बाहर हो गई तो विभाजन के अलावा कोई विकल्प नहीं रह गया.
इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि अँगरेज़ी हुकूमत ने भी स्थिति को बद से बदतर बनाया, माउंटबेटन और रेडक्लिफ़ ने बँटवारे के मामले में बहुत जल्दबाज़ी दिखाई, पहले भारत की आज़ादी के लिए जून 1948 तय किया गया था, माउंटबेटन ने इसे खिसका कर अगस्त 1947 कर दिया गया जिससे भारी अफ़रा-तफ़री फैली और असंख्य लोगों की जानें गईं.
Video caption 70 साल पहले एक शख्स को एक मुल्क के बंटवारे की जिम्मेदारी दी गई थी.
कुल मिलाकर, बँटवारा एक ऐसा मामला है जिसमें सब लोग ये ढूँढने की कोशिश करते हैं कि ज़िम्मेदार कौन है, लेकिन समझने की बात है कि इतनी बड़ी घटना के पीछे एक व्यक्ति नहीं बल्कि बहुत सारी शक्तियाँ काम कर रही होती हैं.
बखेड़िया की वाल से

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