सोतापन्न, सकृदागामी, अनागामी और अर्हत अवस्था क्या हैं?


सोतापन्न, सकृदागामी, अनागामी और अर्हत अवस्था क्या हैं?
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भाग ...【2】
🌺 सकृदागामी अवस्था 🌺
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वह अरिय सावक ( श्रेष्ट श्रावक/शिष्य )जो अब केवल पुण्य कर्म ही करता है। जिसके तीन बन्धन (=संयोजन ) सत्काय दृष्टि (आत्म/स्व/मैं,मेरा नित्य है) , विचिकिच्छा (=सभी सन्देह) और शीलव्रत परामर्श (=शील और व्रत को ही सब कुछ मानना) नष्ट हो जाते हैं और जो राग, द्वेष और मोह को इतना दुर्बल कर देता है कि पुनः उतपन्न नही हो पाते हैं। यदि उतपन्न हो भी जायें तो तीक्ष्ण नहीं होते। ऐसा अरिय श्रावक
केवल एक ही बार लोक में आकर दुःखो का अंत कर निर्वाण पा लेता है।
तीनो संयोजनो के क्षीण होने पर राग (=और चाहिये की भावना), द्वेष (=अप्रिय अनुभूति नही चाहिए की भावना ), मोह ( चाहत,जुड़ाव ) के निर्बल (=तनु) पड़ने पर,
सकृदागामी ‘होता है, एक ही बार (=सकृद् एव) इस लोक मे फिर आ (=जन्म) कर, दुख का अन्त करता (=निर्वाण-प्राप्त होता) हे । यह भी महालि ...धर्म है ० ।
-(महाली सुत्त ,दिर्घ निकाय)
श्रावस्ती में भगवान बुद्ध ने कहा -
मोहं भिक्खवे,
एकधम्मं पजहथ ।
अहं वो पाटिभोगो अनागामितया ।।
- इतिवृत्तक
" भिक्खुओं, केवल एक मोह (मोह दोष) का त्याग कर दो, तो मैं तुम्हारे अनागामी होने की जामिन होता हूँ ।"
सकृदागामी अवस्था को भी दो भागों में विभक्त किया जा सकता है।
1) सकृदागामी मार्ग आरूढ़
2) और सकृदागामी फल प्राप्त।
🌺 अनागामी अवस्था 🌺
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अनागामी वह साधक जिसका इहलोक में अब आगमन नही होगा। वह इस लोग में मृत्यु को प्राप्त कर देवलोक में जन्म ले देवता बन वहीं से अर्हत फल को प्राप्त कर निर्वाण प्राप्त कर लेता है।
इहलोक में अनागामी की अवस्था प्राप्त साधक को दिव्य चक्षु उतपन्न हो सकता है अर्थात वह अमुक व्यक्ति को योजनों भर दूर से भी देख सकता है और उसके मन की बात भी जान सकता है। निम्न कथा में इस प्रकार का वर्णन है!
(सन्दर्भ: चित्त वग्ग धम्मपद कथा 3-3)
ऐसे आर्य श्रावक (श्रेष्ठ शिष्य) के पॉच अवरभागीय संयोजनो अर्थात सत्काय दृष्टि(आत्म/स्व/मैं,मेरा नित्य है), विचिकित्सा, शीलव्रत परामर्श, कामराग (भोग विषयों में राग), प्रतिद्य (=व्यापाद/क्रोध, प्रतिशोध) समाप्त हो जाते हैं। कामराग का पूरी तरह नाश हो जाने के कारण आर्य श्रावक काम-भूमि में पुनः नही आता अर्थात वह अनागामी हो रूप रूपराग और अरूपराग बन्धन नष्ट न हो सकने के कारण रूप या अरुप भूमि में जन्म ले सकता है।
इस प्रकार के देवता या मनुष्य का केवल 1 जन्म और होता है अर्थात वह शुद्धावास देवलोक (सुद्धावास भवन) के 5 लोक में से कहीं जन्म लेकर अन्य शेष ऊपरी संयोजनों को समाप्त कर अर्हत हो भव सागर से मुक्त हो जाता है।
और फिर महालि भिक्खु पांचों अवरभागीय (=ओरभागिय=यही आवागमन मे फंसा रखनेवाले ) संयोजनों के क्षीण होने से औपपातिक (=देव) बन वहाँ (=स्वर्ग-लोक में ) निर्वाण पानेवाला =(फिर यहाँ) न लौटकर आनेवाला होता है । ० यह भी महालि ....धर्म है।
-(महाली सुत्त ,दिर्घ निकाय)
👉 पाँच अवरभागीय-संयोजनों का क्षय किस प्रकार सम्भव है इसकी देशना (=उपदेश) भगवान ने आनंद को महा-मालुंक्य-सुत्तन्त में दी है।
☝️...आनन्द!
आर्यों के दर्शन से अभिज्ञ(=जाननेवाला) , आर्यधर्म (=श्रेष्ठ धम्म) से परिचित, आर्यधर्म में सुविनित ( =सुशिक्षित), सत्पुरूषों के दर्शन से अभिज्ञ, सत्पुरूष-धर्म से परिचित, सत्पुरूष धर्म में सुविनित आर्य श्रावक सत्काय-दृष्टि (=आत्मावाद के बन्धन) से पर्युत्थित=सत्काय-दृष्टि से व्याप्त चित्त हो नहीं विहरता (=ध्यानस्थ विचरण नही करता)। वह उत्पन्न हुई सत्काय-दृष्टि से कलने को (रास्ते को) ठीक से जानता है; (जिसके कारण) उसकी वह सत्काय-दृष्टि अनुशय (=संखार/formations/ गहरी यादें ) रहित बन नष्ट हो जायेगी। वह विचिकित्सा...
अनुशय (=संखार/formations/ गहरी यादें ) रहित बन नष्ट हो जायेगी।
से ॰। वह शीलव्रत-परामर्श से ...अनुशय (=संखार/formations/ गहरी यादें ) रहित बन नष्ट हो जायेगी।
वह काम-राग (=भोग विषयों के राग) से .…अनुशय (=संखार/formations/ गहरी यादें ) रहित बन नष्ट हो जायेगी।
वह व्यापाद (=द्रोह, प्रतिशोध) से ....अनुशय (=संखार/formations/ गहरी यादें ) रहित बन नष्ट हो जायेगी।.......
☝️ऐसे ही आनन्द!
सत्काय (=आत्मावाद) के निरोध (=नाश) के लिये धर्म-उपदेश किये जाते समय जिसका चित्त प्रसन्न नहीं होता (=प्रस्कंदित) नहीं होता, स्थिर नहीं होता, विमुक्त नहीं होता; उसे दुर्बल पुरूष की भाँति जानना चाहिये।
जैसे आनन्द! गंगानदी जल से करार तक भरी, काक-पेया हो; तब एक बलवान् पुरूष (यह कहता) आवे—मैं ॰ पार कर जाऊँगा। (और) वह ॰ सकुशल पार जा सके। ऐसे ही आनन्द! सत्काय-निरोध के लिये धर्म-उपदेश के समय जिसका चित्त प्रसन्न होता है ॰ उसे बलवान् पुरूष की भाँति जानना चाहिये।
“आनन्द! पाँच अवरभागीय-संयोजनों के नाश के लिये क्या मार्ग (=प्रतिपद) हैं?—
☝️यहाँ आनन्द! भिक्षु उपधि (=विषय) को त्यागकर, अकुशल-धर्मो (=बुराइयों) को हटाकर कायिक-दौप्ठुल्यां (=चंचलता) को सर्वथा शांत कर, कामों (=भोगों) से विरहित ॰ प्रथम-ध्यान को प्राप्त हो विहरता है। वह जो कुछ रूप, वेदना, संज्ञा, संस्कार और विज्ञान से संबंध रखने वाले धर्म (=पदार्थ) हैं, उन्हें अनित्य (=सदा न रहने वाले), दुःख, रोग, गंड (=फोडे), शल्य, घाव, अबाघा
(=पीडा), पराये, प्रलोक (=नाशमान), शून्य, और अन्-आत्मा के तौर पर देखता है। वह उन धर्मों से चित्त को निवारण…करके अमृत धातु(= निर्वाण पद) की ओर चित्त को एकाग्र करता है—
यह शांत प्रणीत (=उत्तम) है, जो कि यह संस्कारों का शमन, सारी उपधियों (=विषयों) का परित्याग, तृष्णा का क्षय, विराग, निरोध (रूपी) निर्वाण है। वह उस (अमृत पद, तृष्णा क्षय) में स्थित हो आस्रवों (=चिंत्त-मलों) के क्षय को प्राप्त होता है। यदि आस्रवों के क्षय को नहीं प्राप्त होता, तो उसी धर्म-अनुराग से=उसी धर्म-नन्दी से पाँचों अवरभागीय संयोजनों के क्षय से, औपपाति (=देवता) हो, वहाँ (देवलोक में) जा निर्वाण को प्राप्त होने वाला होता है, (वह) उस लोक से लौटकर आने वाला नहीं होता। आनन्द! यह भी मार्ग (=प्रतिपद) है, पाँच अवरभागीय संयोजनों के नाश के लिये।
☝️“और फिर आनन्द! भिक्षु वितर्क (प्रश्न उत्तरों) विचार के शांत होने पर ॰ द्वितीय-ध्यान को प्राप्त हो विहरता है। ॰ तृतीय-ध्यान को ॰। ॰ चतुर्थ-ध्यान को ॰। और फिर आनन्द! भिक्षु रूप-संज्ञा के सर्वथा छोडने ॰ आकाशानन्त्यायतन को प्राप्त हो विहरता है ॰। ॰ विज्ञानानन्त्यायतन ॰। ॰ आकिंचन्यायतन ॰। ॰ नैवसंज्ञा-नासंज्ञायतन को प्राप्त हो विहरता है। वह जो कुछ वहाँ वेदना, संज्ञा ॰ उस लोक से लौटकर आने वाला नहीं होता। आनन्द! यह भी मार्ग (=प्रतिपद) है।”
🙏“भन्ते!
यदि यही मार्ग=प्रतिपद् है, पाँच अवरभागीय-संयोजनों के प्रहाण (=नाश) के लिये; तो भन्ते! क्यों कोई भिक्षु चेतो-विमुक्ति (=छूटे चित्त-मलों) वाले होते है, कोई प्रज्ञा-विमुक्ति वाले?”
“आनन्द! इसे मैं इन्द्रिय (=मानसिक शक्ति के)-भेद के कारण कहता हूँ।”
भगवान् ने यह कहा, सन्तुष्ट हो आयुष्मान् आनंद ने भगवान् के भाषण को अभिनंदित किया।
-( महा-मालुंक्य-सुत्तन्त ,मज्झिम निकाय )
👉 अनागामी अवस्था के भी दो प्रकार हैं ।
🔸अनागामी मार्ग आरूढ़
🔸अनागामी फल प्राप्त
🌺 अर्हत अवस्था 🌺
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जिस पूर्व अनुगामी साधक/देवता ने अपने सभी आंतरिक अरियों(=शत्रुओं ) आर्थत राग द्वेष मोह लोभ,क्रोध, काम आदि का हन्त कर अपने चित्त पर विजय पा ली है। जिसके सभी भय नष्ट हो गये हैं। जिंसमे विरक्ति उतपन्न हो गई है। जो प्रत्येक क्षण पांच इंद्रिय बलों में श्रद्धा, वीर्य, स्मृति, समाधि और प्रज्ञा का साधक है। जिसका इन सभी इन्द्रियों पर पूर्ण नियंत्रण है। जिसे अब किसी भी प्रकार की मानसिक वेदनाएं नही होती जो अब पूर्णतया स्थिर और शांत है।
जो पाप-और पुण्य से परे चला गया है और जिसके विरोध और अविरोध शांत हो गये हैं जिसे सम्बोधि ज्ञान प्राप्त हो गया है। ऐसे जाग्रत पुरुष को अर्हत कहा जाता है। पूर्ण धम्म ज्ञानी अर्हत शेष सभी बंधनों और आश्रवों को नाश करते हैं जिन्हें सोतापन्न, सकृदागामी, अनागामी नही कर सकते थे।
ऐसे अर्हत भिक्खु ने लौकिक रूप से समस्त भौतिक सुविधाओं को त्याग दिया है , इसीलिए वह उपशांत कहा जाता है
-( शांतकाय भिक्खु की कथा 25-19,धम्मपद,भिक्खु वग्ग )
🌹लौकिक और लोकोत्तर समाधि🌹
जो साधक चित्त की एकाग्रता में बाधक पांच निवरण (=चित्त के खोल), कमाच्छन्द, थीनमिद्ध (=शारिरिक और मानसिक आलस्य) व्यापाद (=क्रोध), औद्धच्च-कौकच्च (=चित्त का उद्धतपन/ चंचलता तथा ककृत्य) विचिकिच्छा ( =सभी सन्देह) को हटाने के लिये साधना करता है। जो चित्त की एकाग्रता में बाधक है। उसे समथ समाधि कहा जाता है। यह लौकिक समाधि है।
विपश्यना चार प्रकार की होती हैं । जब साधक अनित्य (सदा न रहने वाली) , अनात्म (आत्मा नहीं है) तथा दु:ख का विचार कर संयोजन ( = सत्काय-दृष्टि , विचिकिच्छा , शीलव्रत परामर्श , कामराग , रूपराग , अरूपराग , प्रतिघ , मान , औद्धत्य तथा अविद्या ) का प्रहाण (=नाश ) करता है , तो उसे विपश्यना समाधि कहते हैं । विपश्यना समाधि को लोकोत्तर कहते हैं । जब साधक इस काया में कायानुपश्यी हो विहरता है , तो वह कायानुपश्यना है , वेदनाओं में वेदानुपश्यी
हो विहरता है , तो वेदनानुपश्यना है , जब साधक चित्त के दोषों के बारे में चित्तानुपश्यी हो विहरता है , तो वह चित्तानुपश्यना है और धर्मो में धम्मानुपश्यी हो विहरता तो धर्मानुपश्यना है। जो दोनों समाधियों में पारंगत है वह सभी बन्धनों को काट देता है। ऐसा उपदेश भगवान ने सारिपुत्र को ब्राहमण वग्ग की एक कथा में कहा है! जब सारिपुत्र अर्हत्व के लिये दो धर्म पूछते हैं, तब।
सभी अर्हत भगवान (बुद्ध) के पुत्र कहे जाते हैं। अर्हत अवस्था में पूर्व अनुगामी साधक/देवता अन्य शेष सभी संयोजन इहलोक या अन्य उच्च लोक में समाप्त कर साधक/देवता बोधि, परिनिर्वाण और अर्हत्व प्राप्त कर भव सागर से मुक्त हो अर्हत होता है। वह अब कभी भव में नहीं आएगा। चूँकि उसके अन्य आस्रव भी नष्ट जो चुके हैं। जैसे:
🔹(1) कामाश्रव:
पांच काम गुण संबंधी राग कामाश्रव हैं ।
🔹(2) भावश्रव:
रूप और अरूप भवों में उत्पन्न होने का छन्दराग , ध्यान की इच्छा , शाश्वत दृष्टि सहगत उत्पन्न राग , भवों के लिए प्रार्थना भवाश्रव है ।
🔹(3) दृष्टि आश्रव:
पूर्वान्त-अपरान्त वाली 62 प्रकार की दृष्टियां दृष्टि आश्रव हैं ।
🔹(4) अविद्या आश्रव:
दुख , दुख-समुदय ( = दुख उत्पन्न होने के मूल कारण );
दुख निरोध ,
दुख निरोध गामिनी प्रतिपदा ( = आर्य आष्टांगिक मार्ग ) , पूर्वान्त अपरान्त ,
पूर्वापरान्त और प्रतीत्यसमुत्पाद
इन सभी के अज्ञान को अविद्याश्रव कहते हैं ।
भगवान ने ब्रह्मचर्य पालन करने के कारण को बतलाते हुए अर्हत्व को उद्देश्य करके महाली से कहा कि-
आश्रवों (=चित्तमलो) के क्षीण होने से, आश्रवों-रहित चित्त की मुक्ति के ज्ञान द्वारा इसी जन्म मे (निर्वाण को) स्वयं जानकर =साक्षात्कार कर =प्राप्त कर विहार करता है । ० यह भी महालि । धर्म है ०। यह है महालि....अधिक उत्तम धर्म, जिनके साक्षात् करने के लिये, भिक्खु मेरे पास ब्रह्मचर्य पालन करते है ।”
-(महाली सुत्त ,दिर्घ निकाय)
० और फिर भिक्खु ० आस्रवो (=चित्तमलों ) के क्षय से आस्रव-रहित चित-विमुक्ति, प्रज्ञा-विमुक्ति को यही स्वयं जान, साक्षात् कर विहार (=ध्यानस्थ विचरण) करता है । यह चौथा फल है ।....
-( पासादिक-सुत्त, दीर्घ निकाय)
आवुसो ! भिक्खु कैसे विमुक्त-चित्त होता है ?
आवुसो!
भिक्खु का चित्त राग से विमुक्त होता है, द्वेष से विमुक्त होता है , मोह से विमुक्त होता है , इस प्रकार० । ( 10 )
कैसे सुविमुक्त-प्रज्ञ ( प्रज्ञा-विमुक्ति ) होता है ?
आवुसो !
भिक्खु जानता है - ' मेरा राग, मेरा द्वेष, मेरा मोह प्रहीण हो गया , उच्छिन्न = मल मस्तकच्छिन्न-ताल की तरह , अभाव प्राप्त , भविष्य में उत्पन्न होने के अयोग्य हो गया है ।
- ( संगीति-परियाय-सुत्त, दिर्घ निकाय)
“ संदक ! यहां तथागत लोक में उत्पन्न होते हैं । उस धर्म को मार गृहपति-पुत्र सुनता है । वह संशय को छोड़ संशय - रहित होता है । वह नीवरणों को हटा चित्त के दुर्बल करने वाले उपक्लेशों ( = चित्तमलों ) को जानकर से अलग हो . अकुशल धर्मों से अलग हो , प्रथम ध्यान को प्राप्त हो विहरता । संदक, जिस शास्ता के पास श्रावक इस प्रकार के बड़े = उदार ) विशेष को पारे विज्ञ - पुरुष स्वशक्ति भर ब्राह्मचर्य - वास करे । _ _ _ “ और फिर संदक ! ० द्वितीय ध्यान को प्राप्त हो विहरता है०० । तृतीय ध्यान० ० ० ' अब यहां दूसरा कुछ करना नहीं रहा ' - जानता है० । । ” "
संदक ! जो वह भिक्खु० अर्हत् है , वह ( इन ) पांच बातों में असमर्थ है । क्षीण- आस्रव ( =अर्हत,मुक्त ) भिक्खु
( 1 ) जानकर प्राणी नहीं मार सकता ।
( 2 ) चोरी नहीं कर सकता ।
( 3 ) ० मैथुन ... सेवन नहीं कर सकता ।
( 4 ) जानकर झूठ नहीं बोल सकता ।
( 5 ) क्षीणास्रव भिक्खु एकत्रित कर ( अन्न पान आदि ) काम-भोगों को भोग करने के अयोग्य है , जैसे कि वह पहले गृही होते भोगता था । ० । ” "
हे आनंद ! जो वह अर्हत् = क्षीणास्रव भिक्खु है , क्या उसे चलते - बैठते , सोते जागते निरन्तर ..( यह ) ज्ञान दर्शन मौजूद रहता है -
मेरे आस्रव (=चित्त मल ) क्षीण (=नष्ट ) हो गये हैं।
“तो सन्दक!
तेरे लिये एक उपमा देता हूँ। उपमा से भी कोई कोई विज्ञ-पुरूष कहने का मतलब समझ लेते हैं। सन्दक! जैसे पुरूष के हाथ-पैर कटे हो, उसके चलते-बैठते, सोते-जागते निरंतर (होता है), मेरे हाथ-पैर कटे है। इसी प्रकार सन्दक! जो वह अर्हत्=क्षीणास्रव भिक्षु है, उसके ॰ निरंतर …आस्रव क्षीण ही हैं, वह उसकी प्रत्यवेक्षा करके जानता है—‘मेरे-आस्रव क्षीण है।”
-( संदक सुत्त, मज्झिम निकाय )
धम्मपद भिक्खु वग्ग में सभी बन्धनों और बाढ़ों से परे जा चुके भिक्खु के लिये भगवान ने यह गाथा कही है-
"पञ्च छिन्दे पञ्च जहे पञ्च चुत्तरि भावये। ( 11 )
पञ्च सङ्गातिगो भिक्खु ओघतिण्णो ति वुच्चति॥ "
-( 370, भिक्खु वग्ग, धम्मपद )
अर्थात:
सत्यकायदृष्टि (आत्म/स्व/मैं नित्य हूँ), विचिकित्सा , शीलव्रत परामर्श , कामराग और व्यापाद - इन पांच अवरभागीय संयोजनों (=बन्धन) को काटें। रूपराग , अरूपराग , मान , औद्धत्य और अविद्या इन पांच ऊर्वभागीय संयोजनों को छोड़ दें । आगे उनके प्रहाण (=नाश) के लिए श्रद्धा , वीर्य , स्मृति , समाधि और प्रज्ञा इन पांच इंद्रियों की भावना करें। राग , द्वेष , मोह , मान और मिथ्या दृष्टि - इन पांच के संसर्ग को अतिक्रमण कर चुका भिक्खु काम , भव , दृष्टि और अविद्या के ओघों ( = बाढ़ों ) से पार हुआ कहा जाता है ।
एक अर्हत सम्बोधि से परिपूर्ण होता है अब उसके सीखने की लिये कुछ शेष नही बचा यह वह जान लेता है। और अशैक्ष्य भी कहा जाता है।
दस अशैक्ष्य (=अर्हत ) धर्म—
अशैक्ष्य अर्थात जिसे ज्ञान में सीखने के लिये अब कुछ बाकी न रहा।
(1) अशैक्ष्य सम्यक-दृष्टि । (2) ० सम्यक्-संकल्प । (3) ० सम्यक्-वाक् । (3) ०सम्यक्-कर्मान्त । (5) ० सम्यक्-आजीव । (6) ० सम्यक्-व्यायाम । (8) ० सम्यक्-स्मृति । (8) ० सम्यक्-समाधि । (9) ० सम्यक्-ज्ञान (10) अशैक्ष्य सम्यक्-विमुक्ति ।
- ( संगीति-परियाय-सुत्त, दिर्घ निकाय)
🔹ज्ञान की क्या पहचान है ⁉️🔹
“ महाराज ! .... काटना ' ज्ञान की पहचान है और ' दिखा देना ' भी एक दूसरी पहचान है । "
" भन्ते ! ' दिखा देना ' ज्ञान की पहचान कैसे है ? " " महाराज !
ज्ञान उत्पन्न होने से अविद्या रूपी अँधेरा दूर हो जाता है और विद्या रूपी प्रकाश पैदा होता है , जिसमें चारों आर्य - सत्य साफ - साफ दिखाई देते हैं । तब , योगी अनित्य , दुःख और अनात्म को भली भाँति ज्ञान से जान लेता है । " _ _ “
-( दूसरा परिच्छेद, ज्ञान की पहचान, मिलिन्द प्रश्न )
क्या एक गृहस्थ भी अर्हत पद प्राप्त कर सकता है
👉 एक गृहस्थ भी अर्हत पद को पूर्व पुण्य पारमियों और साधना आदि के बल पर अर्हत्व प्राप्त कर सकता है परन्तु उसी दिन उनका किसी आचार्य या उपाध्याय द्वारा प्रवज्जित होना अनिवार्य है। चूँकि अर्हत पद गृहस्थ रहने के अनुकूल नहीं और एक गृहस्थ में इतना बल नही की वह अर्हत्व को सम्भल सके। इसलिये या तो वह प्रवज्जित हो जाता है या परिनिर्वाण पा लेता है। (संक्षेप में)
- ( गृहस्थ का अर्हत हो जाना, मिलिंद प्रश्न )
अर्हत अवस्था को भी दो भागों में विभक्त किया जा सकता है।
🔸1) अर्हत मार्ग आरूढ़ अर्थात जो अर्हत मार्ग पर है
🔸2) और अर्हत फल प्राप्त।
【अट्ठपुरिस पुग्गला अरिय सावक को दान और उससे फलप्राप्त 】
________________________________________
भगवान (बुद्ध) ने आनंद को दक्खिणा-विभंग सुत्त में चौदह प्राति-पुद्गलिक (=व्यक्तिगत) दक्षिणायें (=दान) बतलाई थी:-
आनन्द! यह चौदह प्राति-पुद्गलिक (=व्यक्तिगत) दक्षिणायें (=दान) हैं।
कौन सी चौदह (दक्षिणायें=दान)?:
1) तथागत अर्हत् सम्यक्-संबुद्ध को दान देता है;
यह पहली प्राति-पुद्गलिक दक्षिण (=दान) है।
2) प्रत्येक (पच्चेक) सम्बुद्ध को दक्षिणा (=दान) देता है; यह दुसरी ॰।
3) तथागत के सावक (=शिष्य) अर्हत् को ॰ तीसरी ॰।
4) अर्हत्-फल के साक्षात् करने में लगे हुये को यह चौथी॰।
5) अनागामी को ॰ पाँचवी ॰।
6) अनागामिफल साक्षत् करने में लगे हुये को ॰ छठीं ॰।
7) सकृदागामी को ॰ सातवीं ॰।
8) सकृदागामि-फल साक्षात् करने में लगे को ॰ आठवीं ॰।
9) सोतापन्न को ॰ नवीं ॰।
10) सोपापत्ति (=स्रोत आपत्ति) फल साक्षात् करने में लगे को ॰ दसवीं ॰।
11) गाँव के बाहर के वीत-राग को ॰ ग्यारहवीं ॰।
12) शीलवान् पृथग्जन (=स्रोत आपत्ति आदि को न प्राप्त) को ॰ बारहवीं ॰
13) दुष्शील पृथग्जन को ॰ तेरहवीं ॰।
14) तिर्यग्योनि-गत (=पशु पक्षी आदि) को ॰ चौदहवीं ॰।
वहाँ आनन्द!
तिर्यग्योनि-गत (=पशु-पक्षी आदि) को दान देने में सौ गुनी दक्षिणा (दान) की आशा रखनी चाहिये।
दुष्शील पुथग्जन को दान देने में हजार गुनी दक्षिणा (दान) की आशा रखनी चाहिये।
शील-वान् पृथग्जन में ॰ सौ हजार ॰। ॰ सौ हजार करोड ॰।
स्रोतापत्ति फल साक्षात् करने में लगे को दान देने में असंख्य (=अनगिनत) अप्रमेय (=प्रमाण रहित) दक्षिणा की आशा रखनी चाहिये।
फिर स्रोतआपन्न की बात क्या कहती है?
फिर सकृदागामी की बात क्या कहती है?
फिर अनागामी की बात क्या कहती है?
फिर अर्हत् की बात क्या कहती है?
फिर प्रत्येक(पच्चेक) बुद्ध की बात क्या कहती है?
फिर तथागत अर्हत् सम्यक्-संबुद्ध की बात क्या कहती है?
भगवान ने आनंद से कहा-
☝️आनंद,
यह चार पुरुष-युगल (स्रोतआपन्न, सकृदागामी, अनागामी और अर्हत्) और आठ पुरुष (=पुद्गल) है, यही भगवान का श्रावक-संघ है, (जोकि) आह्वान करने योग्य है, पाहुना बनाने योग्य है, दान देने योग्य है, हाथ जोड़ने योग्य है, और लोक के लिये पुण्य (बोने) का क्षेत्र है ।’
-( धर्म आदर्श, महापरिनिब्बान सुत्त, दीर्घ निकाय )
जय मङ्गल धम्म ।
🙏🙏🙏
नमो बुद्धाय ।।
अनिल गौतम
(बुद्ध, धम्म, संघ अनुगामी)
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सोतापन्न, सकृदागामी, अनागामी और अर्हत अवस्था क्या हैं?भाग ....【1】
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स्रोत :
अप्पमाद वग्ग, धम्मपद
चित्त वग्ग, धम्मपद
अरहत वग्ग, धम्मपद
ब्राह्मण वग्ग,धम्मपद
भिक्खु वग्ग, धम्मपद
संदक सुत्त, मज्झिम निकाय
दक्खिणा-विभंग-सुत्त,मज्झिम निकाय
महा-मालुंक्य-सुत्तन्त, मज्झिम निकाय
महागोविन्द सुत्त, दिर्घ निकाय
महापरिनिब्बान सुत्त, दीर्घ निकाय
संगीति-परियाय-सुत्त, दिर्घ निकाय
पासादिक-सुत्त, दीर्घ निकाय
महाली सुत्त, दीर्घ निकाय
सहस्स-भिक्खुणी-सुत्त, संयुक्त निकाय 54:2:2
एस एन गोयन्का जी की देशना:
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