Posts

Showing posts from December, 2020

वेदना और दुःख का सम्बन्ध

चित्त को संस्कारित किया जाता है जिस कारण दुखो का अम्बार लग जाता है किन्तु विपशना में चित्त को संस्कार मुक्त किया जाता है! इस कारण साधक लौकिक आसक्तियो से मुक्त होने लगता है और उसको दुःख की अनुभूति नहीं होती है! वास्तव में संसार में दुःख जैसी कोई चीज नहीं है! लौकिक वस्तुओ की आसक्ति दुःख की अनुभूति कराती है! Vinod Kumar मित्र वेदना शरीर में उत्पन्न होती है किन्तु मन इसे चित्त द्वारा महसूस करता है! जब मन चित्त के साथ नही होता तो शरीर में उत्पन्न वेदना की मन को अनुभूति नहीं होती है! मन की चित्त के साथ आसक्ति दुःख का कारण है! Vinod Kumar मैं बुद्ध से अधिक ज्ञानी अभी तो नही हूँ! प्रतीत्य-समुत्पाद पर चर्चा, बुद्ध अधपके साधको से करते थे ताकि वे शीघ्रता से पक जाएँ! बुद्ध नवीन साधको और सामन्य-गृह्स्तो से प्रतीत्य-समुत्पाद की चर्चा नही करते थे! फिर कहूँगा काने से रंगों की चर्चा करना सार्थक हो सकता है परन्तु अंधे से रंगों की चर्चा करना ही मूढ़ता है!

उर्जा को सही प्रयोग

उर्जा को सही प्रयोग DrRamesh Singh आपकी बात सत्य भी हो सकती है परन्तु 2500 साल पहले कुछ तो था! हो सकता है कचरा ही हो आध्यात्मिकता के जगत में! रहगयी बात वास्तु-कला और लेखन की तो गुप्तकाल में अपने स्वर्णिम रूप में था उसके बाद मुगल काल में, दक्षिण भारत और मध्य भारत में भी उक्त पर जोर दिया गया! बुद्ध के अशोक कालीन जो स्तंभ मिले हैं उनमें लवणता का अभाव है सीधा-सीधा लिख दिया गया है! जो बाद में भी लिखा जाता रहा! हर्ष वर्धन के काल तक तो उत्तर और दक्षिण भारत में बौद्ध दर्शन का ही बोल-बाला रहा है! वैदिक ग्रन्थ (जो अध्ययन से ही कचरे जैसे प्रतीत होते हैं) राज्य की प्राथमिकता में नही थे! राजपूत काल में शैशव और वैष्णो पंथ द्वारा एक दुसरे को नीचा दिखने के चक्कर में कचरे की छटनी हुई, जिससे उपनिषद, ब्राह्मण ग्रन्थ और पुराणों निकले और इनको विस्तार दिया गया! राज्य का साथ मिलने के कारण पुरोहितो और पंडों की बड़ी फ़ौज तैयार हो गयी! साधना एक ऐसी कला है जिसके अभ्यास से विज्ञान निकलता है जो आभ्यास नहीं मात्र अध्ययन करता है तो केवल मूढ़ता निकलती है! जिन भिक्षुओ ने शैशव और वैष्णो पंथ अपना लिया वे ही ब्रह्मचारी, न...

बोधिसत्व और सम्यक सम्बुद्ध में अंतर ....

बोधिसत्व और सम्यक सम्बुद्ध में अंतर .... दो शब्द प्रयोग होते हैं! प्रथम बोधिसत्व दूसरा सम्यक सम्बुद्ध और बुद्ध ! बुद्ध वंशावली के अनुसार कई कल्पो में कोई सम्यक सम्बुद्ध होता है उस सम्यक सम्बुद्ध के साथ कई बुद्ध हो सकते हैं! बुद्ध स्वतंत्र रूप से भी उत्त्पन्न होते हैं! नास्तिकवादीयों के लिए मेरी बात स्वीकार करना कठिन होगा किन्तु आपने प्रश्न उठाया है तो मैं इसका उत्तर देने को बाध्य हूँ! बुद्ध वंशावली के अनुसार वह व्यक्ति अपने अनंत जन्मो तक सील का पालन करते हुए अपनी आत्मा को विकार विमुक्त करने का प्रयास करता हैं, अपने जिस अंतिम जन्म में वह आत्मा को विकार विमुक्त कर लेता है, उसका वह जन्म सम्यक सम्बुद्ध, बुद्ध या अरहंत का होता है! ऐसे व्यक्ति जो अपने अनंत जन्मो तक जनकल्याण के कार्य करता है तथा सामान्य जन से अधिक प्रतिभावान दिखता है ऐसे व्यक्ति को बुद्ध दर्शन में बोधिसत्व कहा जाता है! इसी आधार पर बाबा साहब को भी बोधिसत्व कहा जाता है! कुछ महाथेरो का मानना है कि बाबा साहब ही आने वाले सम्यक सम्बुद्ध है और अपनी पारमिताओ को पूरा कर रहे हैं! जिस प्रकार जन्म लिए व्यक्ति की सामान्य आयु 120 मानी जाती...

सवाल-जबाब -2

Kamlesh Kumar Mittra मित्र, विज्ञान विकास के चरण में है! जो आज की मशीनों की पकड़ में नही है कल आजायेगा, तब मान लेना ! · Reply · Share · 10h Vinod Kumar badge icon Author Kamlesh Kumar Mittra जिन गुण-विशेषताओं से युक्त बताया जाता है, उन्हें देखते हुए और उनकी समीक्षा करने पर यह तत्व केवल कल्पना सिद्ध होता है ! · Reply · Share · 7h Kamlesh Kumar Mittra Vinod Kumar मित्र, पहले लकड़ी के औजार बने, फिर लोहे के, फिर लोहे की मशीने बनी, फिर डीजल इंजन की मशीने बनी, फिर इलेक्ट्रिक मशीने बनी, उसके बाद लेक्ट्रोनिक मशीने बनी, इस समय मैग्नेटिक और सोलर उर्जा पर आधारित मशीने बन रही हैं, कुछ वैज्ञानिक हायड्रोजन उर्जा की मशीने बनाने के लिए पानी का प्रयोग कर रहे हैं! हर विकास के क्रम में आगे के अविष्कार अकल्पनीय रहे हैं परन्तु वे सब हुए हैं! मैं एक इंजीनिरिंग कालेज में इलेक्ट्रॉनिक्स का टीचर भी रहा हूँ इसलिए कहता हूँ जो आज नही दिखता है इससे यह सिद्ध नही होता कि वह है नही! आकाश गंगा के लाखो तारे दिखाई नहीं देते किन्तु कल दुर्वीन की पकड़ में आजायेंगे! ...... · Reply · Share · 7h Vinod Kumar badge icon Autho...

आत्मा है .......

Image
आत्मा है ....... Vinod Kumar आपका प्रश्न एडवांस है! इस पर चर्चा करना उचित न होगा! साधना की प्रमुख रूप से दो पद्दतियां हैं एक बहिर्मुखी, दूसरी अंतर्मुखी ! कबीर, रविदास, बुद्ध आदि अरहंत साधना की अंतर्मुखी पद्दति से जुड़े रहे हैं! साधना की उपलब्धि के रूप में छ: प्रकार की अभिज्ञायें प्राप्त होती हैं जिनको सभी छ: अभिज्ञान प्राप्त हो जाते हैं वे सम्यक सम्बुद्ध होते हैं, अन्य अरहंत की कोटि में आते हैं! ऐसा उल्लेख महा-सतिपटठान में मिलता है! मैं भी साधना की अंतर्मुखी पद्दति से जुड़ा हूँ और दिन-प्रतिदिन सूक्ष्मता की तरफ बढ़ता जाता हूँ जैसा आचार्यो ने कहा था, इस आधार पर मेरी चिंतनमय प्रज्ञा उस उर्जा की अनुभूति कर पाती है जो शरीर से अलग है यह आत्मा भी हो सकती है किन्तु ध्यान रहे भगवान बुद्ध ने कहा है कि आत्मा भी अजर-अमर नहीं है यदि इसको भी विकार विमुक्त कर दिया जाये तब अनंत्ता की स्थिति उत्पन्न हो जाती है! शरीर तो अग्नि के संपर्क में आने से नष्ट हो जाता है किन्तु आत्मा विकार विमुक्ति होने पर ही समाप्त होती है! हिन्दू और बौद्ध दर्शन की बीच यही मूल भेद है ?(हिन्दू-वैदिक) या उपनिषद वादी कहते हैं आत्म...

सवालों के जबाब

Ramprasad Sikandar मित्र भगवान बुद्ध ने कहा है कि भीख मांगने से कोई भिक्षु नही बन जाता, (अर्थात हर भीख मांगने बाला भिखारी नहीं होता) ......... ढाई आखर पढ़े बिना कोई ग्यानी नही बनता .......... Ramprasad Sikandar मित्र आपका कमेन्ट पढ़ कर मैं चक्कर में पड़ गया अंध भक्त कौन है? आस्तिकता में जिसकी आस्था है वह अंध भक्त है तो जिसकी नास्तिकता में आस्था है वह भी अंधभक्त ही है! ज्ञानी तो वह है जो कबीर के कहे अनुसार "....सार-सार को गहि रहे थोथा दे उड़ाए..." ! मित्र आपकी भाषा पर पकड़ बहुत कमजोर है! आप बात अधर्म की करते हो और शब्द "धर्म" प्रयोग करते हो! धारण करे सो धर्म है वर्ना कोरी बात! पेट का लीवर कहे मुझे आजादी चाहिए क्या दी जा सकती है? लीवर को शरीर से बाहर निकाला जा सकता है! लीवर का धर्म है शरीर के लिए बंधन में रहे परन्तु लीवर के निर्माण में प्रयुक्त सामग्री को आजादी है कि वह खून के साथ मिलकर किसी अन्य अंग की संरचना में शामिल हो जाये या शारीर से बहार निकल जाये! धर्म बंधन है, आजादी भी धर्म है, पहले समझो तो धर्म क्या है और धारण क्या करना है और छोड़ना क्या है! Santosh Agrawal ...

कर्म-कांड मात्र सामाजिक-नाटक

कर्म-कांड मात्र सामाजिक-नाटक Badan Singh Bauddh भाई मेरे, शादी सम्बन्धी कोई भी कर्म-कांड मात्र एक नाटक है! नाटक मनोरंजन के लिए होता है इस बात से कोई फर्क नही पड़ता कि फेरे पांच लिए जा रहे हैं या सात या केवल वचन दिया जा रहा है! संतति की उत्त्पति के लिए यह उद्घोषणा है इस नाटक को कितना ही लम्बा कर दो या छोटा कोई फर्क नही पड़ता है! उदाहरण - सुन्नी की शादी मौलवी कराता है जबकि शिया की शादी में मौलवी की जरुरत नही होती, दोनों ही शादियों में एक बात समरूप है वह यह है जब-तक दोनों (स्त्री-पुरुष) शारीरिक सम्बन्ध नही बना लेते हैं, न निकाह-परवान चढ़ता है और न ही दोनों को पति-पत्नी माना जाता है! मैं कई बार कहता हूँ मनुवाद के उलटे खड़ा हो जाना आंबेडकरवाद नही है, ऐसे विषयों को बहुत अधिक अहमियत देने की आवश्यकता नही है! जिन विषयों पर चर्चा हो वह इस प्रकार के हों, कि दलित-जाति में कहाँ प्रतिभाएं उत्पन्न हुई हैं? क्या उनकी प्रगति में कोई बाधा तो नही आ रही है! सात साल का बच्चा अपनी प्रतिभाओ का प्रदर्शन करने लगता है उसको उपयुक्त वातावरण मिलेगा तो प्रतिभा विकसित होकर दलित समाज का उत्तथान करेगी अन्यथा समाप्त हो ...

मूढ़ की संगत न करें:-

मूढ़ की संगत न करें:- मूर्खता पूर्ण विषयों पर तर्क-वितर्क करना उच्च कोटि की मूर्खता है किन्तु है मूर्खता ही! ऐसे विषयों को सुने और मुस्कराते हुए निकल जाएँ ! जब कुत्ता बोलने लगे और हाथी उड़ने लगे तो ऐसे-विषयों को कथा-कहानी कहा जाता है जिसके सार पर चर्चा की जाती है नाकि तथ्य पर, जो व्यक्ति कथा-कहानियों के तथ्य पर चर्चा करने पर जोर देता है मूर्ख है! कथा कहानियो के पत्रों और तथ्यों की भौतिक सत्यता पर चर्चा नहीं की जाती है बल्कि उससे निकले सन्देश को ग्रहण किया जाता है अथवा त्याग दिया जाता है! जो मुर्ख कथा-कहानियों को इतिहास समझता है और उनमे भातिक गुणों को खोजता है मूढ़ है! भगवान बुद्ध ने भिखुओ से कहा है कि मूढ़ की संगत न करें ! Himanshumeagie Sharma महाकश्यप ने प्रथम संगीति करके बुद्ध बचनो को तिपिटक में संग्रहीत किया जानते हो क्यों? ताकि आरएसएस वाले भगवान बुद्ध के मुख से अपनी घ्रणित मंशा का दुष-प्रचार न करने लगें! इसका दुष-परिणाम यह हुआ कि हिंदूओ ने बुद्ध विश्व-विद्यालय नष्ट किये और करवाए! जोगेंद्रनाथ मंडल की आत्मकथा कहने वाला, क्या आरएसएस का प्रवक्ता नही है? अपने दिल पर हाथ रख कर अपने से...