सवाल-जबाब -2
Kamlesh Kumar Mittra
मित्र, विज्ञान विकास के चरण में है! जो आज की मशीनों की पकड़ में नही है कल आजायेगा, तब मान लेना !
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Vinod Kumar
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Kamlesh Kumar Mittra
जिन गुण-विशेषताओं से युक्त बताया जाता है, उन्हें देखते हुए और उनकी समीक्षा करने पर यह तत्व केवल कल्पना सिद्ध होता है !
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Kamlesh Kumar Mittra
Vinod Kumar मित्र, पहले लकड़ी के औजार बने, फिर लोहे के, फिर लोहे की मशीने बनी, फिर डीजल इंजन की मशीने बनी, फिर इलेक्ट्रिक मशीने बनी, उसके बाद लेक्ट्रोनिक मशीने बनी, इस समय मैग्नेटिक और सोलर उर्जा पर आधारित मशीने बन रही हैं, कुछ वैज्ञानिक हायड्रोजन उर्जा की मशीने बनाने के लिए पानी का प्रयोग कर रहे हैं! हर विकास के क्रम में आगे के अविष्कार अकल्पनीय रहे हैं परन्तु वे सब हुए हैं! मैं एक इंजीनिरिंग कालेज में इलेक्ट्रॉनिक्स का टीचर भी रहा हूँ इसलिए कहता हूँ जो आज नही दिखता है इससे यह सिद्ध नही होता कि वह है नही! आकाश गंगा के लाखो तारे दिखाई नहीं देते किन्तु कल दुर्वीन की पकड़ में आजायेंगे! ......
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Vinod Kumar
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तो आप ये कहना चाहते हैं कि एक दिन विज्ञान भी आत्मा के अस्तित्व को सिद्ध कर ही देगा !!
इतने यकीन की वजह ??
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Kamlesh Kumar Mittra
Vinod Kumar मैडिटेशन !
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Vinod Kumar
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Kamlesh Kumar Mittra !
अंत में वही दीखेगा जो गुरु दिखाना चाहता है !!
ऐसे गुरू चाहें तो शिष्य के मस्तिष्क को कंट्रोल करके उससे किसी का मर्डर भी करा सकते हैं, और व्यक्ति को स्मरण भी नहीं रहेगा ! ऐसा श्याम मानव जी का कहना है !!
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Kamlesh Kumar Mittra
Vinod Kumar आपका प्रश्न एडवांस है! इस पर चर्चा करना उचित न होगा! साधना की प्रमुख रूप से दो पद्दतियां हैं एक बहिर्मुखी, दूसरी अंतर्मुखी ! कबीर, रविदास, बुद्ध आदि अरहंत साधना की अंतर्मुखी पद्दति से जुड़े रहे हैं! साधना की उपलब्धि के रूप में छ: प्रकार की अभिज्ञायें प्राप्त होती हैं जिनको सभी छ: अभिज्ञान प्राप्त हो जाते हैं वे सम्यक सम्बुद्ध होते हैं, अन्य अरहंत की कोटि में आते हैं! ऐसा उल्लेख महा-सतिपटठान में मिलता है! मैं भी साधना की अंतर्मुखी पद्दति से जुड़ा हूँ और दिन-प्रतिदिन सूक्ष्मता की तरफ बढ़ता जाता हूँ जैसा आचार्यो ने कहा था, इस आधार पर मेरी चिंतनमय प्रज्ञा उस उर्जा की अनुभूति कर पाती है जो शरीर से अलग है यह आत्मा भी हो सकती है किन्तु ध्यान रहे भगवान बुद्ध ने कहा है कि आत्मा भी अजर-अमर नहीं है यदि इसको भी विकार विमुक्त कर दिया जाये तब अनंत्ता की स्थिति उत्पन्न हो जाती है! शरीर तो अग्नि के संपर्क में आने से नष्ट हो जाता है किन्तु आत्मा विकार विमुक्ति होने पर ही समाप्त होती है! हिन्दू और बौद्ध दर्शन की बीच यही मूल भेद है ?(हिन्दू-वैदिक) या उपनिषद वादी कहते हैं आत्मा अजर-अमर है जबकि बौद्ध दर्शन कहता है कि विकार-विमुक्त होने पर आत्मा भी नष्ट हो जाती है! दूसरा भेद आत्मा की उत्त्पति के बारे में है उपनिषद-वादी कहते है कि कोई ईश्वर है जो आत्मा को उत्त्पन्न करता है और अपने में विलीन कर लेता है! जैन दर्शन भी इस बात को नही मानता की आत्मा को उत्त्पन्न करने वाला कोई भगवान है जबकि वे लोग आत्मा को शास्वत मानते हैं! बौद्ध दर्शन मानता है प्रकृति के अनुक्रम में आत्मा उत्पन्न और नष्ट होती रहती है बस इसका जीवन काल अधिक होता है होशावान आपनी आत्मा को अपने नियंत्रण में रखता है जबकि वेहोश आत्मा की स्वछंदता के साथ बहता रहता है! इसी कारण बुद्ध के अष्टांगिक मार्ग में सील को साधन का आधार कहा गया है! सील को सयामित रखे बिना किसी की आत्मा मुक्त नही हो सकती जबकि जीवन दुःख से भरा हुआ है, सीलवान कम दुःख पता है और देता है जबकि दुश्सील अधिक दुःख पाता है और दुःख बांटता है! यह सब बाते मैं अपने अनुभाव के आधार पर कह रहा हूँ! यह परिचित्त ज्ञान कहा जाता है जिसका ज्ञान धीरे-धीरे होता जाता है! ध्यान-साधन से प्राप्त ज्ञान आनंत है उसको लिखकर और बोल कर पूरा नहीं कहा जा सकता है! मैं साधन की जिस अवस्था में हूँ उस आधार पर कह सकता हूँ आत्मा है और सामान्य मनुष्य उसकी स्वछंदता का गुलाम होता है! शरीर को दिए गए कास्ट को आत्मा महसूस करती है और प्रतिक्रिया भी करती है अपने पुराने संस्कारिक ज्ञान के आधार पर आदि ...! सबका मगंल हो, नमो बुद्धाय !
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Vinod Kumar
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Kamlesh Kumar Mittra
कथित आत्मा व्यक्ति के 'मन' से भिन्न तत्व नहीं है ।
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Vinod Kumar
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मन बुद्धि से अगम्य नहीं है । मन विकार से ग्रस्त हो सकता है, इसलिए आज इलाज हो जाता है !
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Kamlesh Kumar Mittra
Vinod Kumar मन तो जन्म से मिलता है और हर प्राणी का अलग-अलग होता है जबकि बुद्धि समाज देता है यह संस्कारो से विकसित होती हुई जड़ हो जाती है! इन्ही जड़-गंथियो को खोलने के लिए ध्यान-साधना और सील की आवश्यकता होती है जो सील का पालन करते हुए ध्यान-साधन करता है वह आस्तिकता-नास्तिकता के झमेलों से मुक्त हो जाता है! अब-तक की किसी चिकित्सा पद्दति में बुद्धि की विकृति से उत्पन्न मानसिक रोगों का इलाज नही है! चाहे ऐसे रोगी को कितने भी इलेक्ट्रिक-सोक क्यों न दे दिए जाएँ! धर्म-अन्धता के रोग का मात्र एक इलाज है सील-युक्त ध्यान-साधना (अंतर्मुखी) अन्य कोई मनोचिकित्सक धर्म-अन्धता के रोग को दूर नही कर सकता है! अन्य छोटेमोटे स्नायु रोगों तथा आदतों को भी सील-युक्त ध्यान-साधना से दूर किया जा सकता है! इसके बाद व्यक्ति के काम-क्रोध, लोभ, भय आदि मानसिक रोग दूर होने लगते हैं जिस कारण व्यक्ति दुःख-ग्रहण करने की और दुःख देने की प्रवृति को छोड़ता चला जाता है! इस कारण बुद्ध ने इसका प्रचार-प्रसार किया और जब सम्राट अशोक बुद्ध द्वारा बताई इस ध्यान-साधन के संपर्क में आया तो उसने हिंसा का मार्ग त्याग कर धम्म-विजय का प्रचार प्रसार किया ! नमो बुद्धाय, सबका मंगल हो !
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Kamlesh Kumar Mittra
Vinod Kumar मित्र कथित मन और शरीर को चलाने वाली ऊर्जा आलग-अलग है, यह मेरा अध्ययन नही अनुभव है! शरीर इन दोनों से अलग है इसीलिए बुद्ध ने उपनिषद-वादियों के विपरीत मन को एक इन्द्रीय माना है! उपनिषद-वादियों के अनुसार पांच ज्ञान इन्द्रियाँ हैं जबकि बुद्ध दर्शन के अनुसार छः ज्ञान इन्द्रियां है यह छठी इन्द्रिय मन ही है यह आत्मा या अनंत्ता से अलग है!
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