आत्मा है .......
आत्मा है .......
Vinod Kumar आपका प्रश्न एडवांस है! इस पर चर्चा करना उचित न होगा! साधना की प्रमुख रूप से दो पद्दतियां हैं एक बहिर्मुखी, दूसरी अंतर्मुखी ! कबीर, रविदास, बुद्ध आदि अरहंत साधना की अंतर्मुखी पद्दति से जुड़े रहे हैं! साधना की उपलब्धि के रूप में छ: प्रकार की अभिज्ञायें प्राप्त होती हैं जिनको सभी छ: अभिज्ञान प्राप्त हो जाते हैं वे सम्यक सम्बुद्ध होते हैं, अन्य अरहंत की कोटि में आते हैं! ऐसा उल्लेख महा-सतिपटठान में मिलता है! मैं भी साधना की अंतर्मुखी पद्दति से जुड़ा हूँ और दिन-प्रतिदिन सूक्ष्मता की तरफ बढ़ता जाता हूँ जैसा आचार्यो ने कहा था, इस आधार पर मेरी चिंतनमय प्रज्ञा उस उर्जा की अनुभूति कर पाती है जो शरीर से अलग है यह आत्मा भी हो सकती है किन्तु ध्यान रहे भगवान बुद्ध ने कहा है कि आत्मा भी अजर-अमर नहीं है यदि इसको भी विकार विमुक्त कर दिया जाये तब अनंत्ता की स्थिति उत्पन्न हो जाती है! शरीर तो अग्नि के संपर्क में आने से नष्ट हो जाता है किन्तु आत्मा विकार विमुक्ति होने पर ही समाप्त होती है! हिन्दू और बौद्ध दर्शन की बीच यही मूल भेद है ?(हिन्दू-वैदिक) या उपनिषद वादी कहते हैं आत्मा अजर-अमर है जबकि बौद्ध दर्शन कहता है कि विकार-विमुक्त होने पर आत्मा भी नष्ट हो जाती है! दूसरा भेद आत्मा की उत्त्पति के बारे में है उपनिषद-वादी कहते है कि कोई ईश्वर है जो आत्मा को उत्त्पन्न करता है और अपने में विलीन कर लेता है! जैन दर्शन भी इस बात को नही मानता की आत्मा को उत्त्पन्न करने वाला कोई भगवान है जबकि वे लोग आत्मा को शास्वत मानते हैं! बौद्ध दर्शन मानता है प्रकृति के अनुक्रम में आत्मा उत्पन्न और नष्ट होती रहती है बस इसका जीवन काल अधिक होता है होशावान आपनी आत्मा को अपने नियंत्रण में रखता है जबकि वेहोश आत्मा की स्वछंदता के साथ बहता रहता है! इसी कारण बुद्ध के अष्टांगिक मार्ग में सील को साधन का आधार कहा गया है! सील को सयामित रखे बिना किसी की आत्मा मुक्त नही हो सकती जबकि जीवन दुःख से भरा हुआ है, सीलवान कम दुःख पता है और देता है जबकि दुश्सील अधिक दुःख पाता है और दुःख बांटता है! यह सब बाते मैं अपने अनुभाव के आधार पर कह रहा हूँ! यह परिचित्त ज्ञान कहा जाता है जिसका ज्ञान धीरे-धीरे होता जाता है! ध्यान-साधन से प्राप्त ज्ञान आनंत है उसको लिखकर और बोल कर पूरा नहीं कहा जा सकता है! मैं साधन की जिस अवस्था में हूँ उस आधार पर कह सकता हूँ आत्मा है और सामान्य मनुष्य उसकी स्वछंदता का गुलाम होता है! शरीर को दिए गए कास्ट को आत्मा महसूस करती है और प्रतिक्रिया भी करती है अपने पुराने संस्कारिक ज्ञान के आधार पर आदि ...! सबका मगंल हो, नमो बुद्धाय !
साधना के लाभ -
Vinod Kumar मन तो जन्म से मिलता है और हर प्राणी का अलग-अलग होता है जबकि बुद्धि समाज देता है यह संस्कारो से विकसित होती हुई जड़ हो जाती है! इन्ही जड़-गंथियो को खोलने के लिए ध्यान-साधना और सील की आवश्यकता होती है जो सील का पालन करते हुए ध्यान-साधन करता है वह आस्तिकता-नास्तिकता के झमेलों से मुक्त हो जाता है! अब-तक की किसी चिकित्सा पद्दति में बुद्धि की विकृति से उत्पन्न मानसिक रोगों का इलाज नही है! चाहे ऐसे रोगी को कितने भी इलेक्ट्रिक-सोक क्यों न दे दिए जाएँ! धर्म-अन्धता के रोग का मात्र एक इलाज है सील-युक्त ध्यान-साधना (अंतर्मुखी) अन्य कोई मनोचिकित्सक धर्म-अन्धता के रोग को दूर नही कर सकता है! अन्य छोटेमोटे स्नायु रोगों तथा आदतों को भी सील-युक्त ध्यान-साधना से दूर किया जा सकता है! इसके बाद व्यक्ति के काम-क्रोध, लोभ, भय आदि मानसिक रोग दूर होने लगते हैं जिस कारण व्यक्ति दुःख-ग्रहण करने की और दुःख देने की प्रवृति को छोड़ता चला जाता है! इस कारण बुद्ध ने इसका प्रचार-प्रसार किया और जब सम्राट अशोक बुद्ध द्वारा बताई इस ध्यान-साधन के संपर्क में आया तो उसने हिंसा का मार्ग त्याग कर धम्म-विजय का प्रचार प्रसार किया ! नमो बुद्धाय, सबका मंगल हो !
Vinod Kumar मित्र कथित मन और शरीर को चलाने वाली ऊर्जा आलग-अलग है, यह मेरा अध्ययन नही अनुभव है! शरीर इन दोनों से अलग है इसीलिए बुद्ध ने उपनिषद-वादियों के विपरीत मन को एक इन्द्रीय माना है! उपनिषद-वादियों के अनुसार पांच ज्ञान इन्द्रियाँ हैं जबकि बुद्ध दर्शन के अनुसार छः ज्ञान इन्द्रियां है यह छठी इन्द्रिय मन ही है यह आत्मा या अनंत्ता से अलग है!
vinod kumar यह चक्र वाणी विलास का विषय नही है! यह डाक्टर की उस पर्ची के सामान है जिसमें कुछ दवाइयां लिखी हैं जिनको लोगे तो लाभ मिलेगा! यह मनुष्य-जाति ही नही सम्पूर्ण प्राणी-जगत ( स्थूल और सूक्ष्म शरीरधारी सहित गैर-पदार्थधारी प्राणी अर्थात केवल चित्त्धारी) के जन्म और मृत्यु का माया-जाल है! जो इसको समझ(अनुभूति के स्तर पर) लेता है वह अपनी आत्मा की भी निर्जरा कर लेता है! गीता (भगवतगीता ) और प्रतीत्य-समुत्पाद में यही अंतर है गीता कहती है आत्मा-अजर-अमर है जबकि प्रतीत्य-समुत्पाद की यह श्रंखला कहती है कि तृष्णा पर रोक लगा कर आत्मा की भी निर्जरा की जा सकती है अर्थात यह अजर-अमर नही है इस आधार पर बुद्ध दर्शन में मिलाता है कि "देवताओ की भी मृत्यु होती है और ब्रह्मा की भी मृत्यु होती है उन्हें भी कर्मो के फल भुगतने पड़ते हैं!" देवताओ और ब्रह्मा की मृत्यु सुनते ही वेद-पाठी भड़क जाते हैं क्योंकि वेदों में शरीर की निर्जरा का तो उल्लेख है किन्तु आत्मा की निर्जरा का उल्लेख नही है! मूढ़ वेद-पाठी अपनी श्रेष्ठता सिद्ध करने के लिए बुद्ध साहित्य को मिटाते और प्रछिप्त करते रहे हैं!


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