वेदना और दुःख का सम्बन्ध
चित्त को संस्कारित किया जाता है जिस कारण दुखो का अम्बार लग जाता है किन्तु विपशना में चित्त को संस्कार मुक्त किया जाता है! इस कारण साधक लौकिक आसक्तियो से मुक्त होने लगता है और उसको दुःख की अनुभूति नहीं होती है! वास्तव में संसार में दुःख जैसी कोई चीज नहीं है! लौकिक वस्तुओ की आसक्ति दुःख की अनुभूति कराती है!
Vinod Kumar मित्र वेदना शरीर में उत्पन्न होती है किन्तु मन इसे चित्त द्वारा महसूस करता है! जब मन चित्त के साथ नही होता तो शरीर में उत्पन्न वेदना की मन को अनुभूति नहीं होती है! मन की चित्त के साथ आसक्ति दुःख का कारण है!
Vinod Kumar मैं बुद्ध से अधिक ज्ञानी अभी तो नही हूँ! प्रतीत्य-समुत्पाद पर चर्चा, बुद्ध अधपके साधको से करते थे ताकि वे शीघ्रता से पक जाएँ! बुद्ध नवीन साधको और सामन्य-गृह्स्तो से प्रतीत्य-समुत्पाद की चर्चा नही करते थे! फिर कहूँगा काने से रंगों की चर्चा करना सार्थक हो सकता है परन्तु अंधे से रंगों की चर्चा करना ही मूढ़ता है!
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