कर्म-कांड मात्र सामाजिक-नाटक
कर्म-कांड मात्र सामाजिक-नाटक
Badan Singh Bauddh भाई मेरे, शादी सम्बन्धी कोई भी कर्म-कांड मात्र एक नाटक है! नाटक मनोरंजन के लिए होता है इस बात से कोई फर्क नही पड़ता कि फेरे पांच लिए जा रहे हैं या सात या केवल वचन दिया जा रहा है! संतति की उत्त्पति के लिए यह उद्घोषणा है इस नाटक को कितना ही लम्बा कर दो या छोटा कोई फर्क नही पड़ता है! उदाहरण - सुन्नी की शादी मौलवी कराता है जबकि शिया की शादी में मौलवी की जरुरत नही होती, दोनों ही शादियों में एक बात समरूप है वह यह है जब-तक दोनों (स्त्री-पुरुष) शारीरिक सम्बन्ध नही बना लेते हैं, न निकाह-परवान चढ़ता है और न ही दोनों को पति-पत्नी माना जाता है! मैं कई बार कहता हूँ मनुवाद के उलटे खड़ा हो जाना आंबेडकरवाद नही है, ऐसे विषयों को बहुत अधिक अहमियत देने की आवश्यकता नही है! जिन विषयों पर चर्चा हो वह इस प्रकार के हों, कि दलित-जाति में कहाँ प्रतिभाएं उत्पन्न हुई हैं? क्या उनकी प्रगति में कोई बाधा तो नही आ रही है! सात साल का बच्चा अपनी प्रतिभाओ का प्रदर्शन करने लगता है उसको उपयुक्त वातावरण मिलेगा तो प्रतिभा विकसित होकर दलित समाज का उत्तथान करेगी अन्यथा समाप्त हो जाएगी! शहरी और ग्रामीण दलित मात्र इसलिए दलित है क्योंकि वह अपने समाज में उतपन्न हुई प्रतिभाओ को संरक्षण प्रदान नही करता है और अनावश्यक चर्चो को प्रमुखता देता है! दूसरी ओर मनुवाद दलितों को ऐसे विषय देता रहता है ताकि वे अन-उपयुक्त विषयों की चर्चा में उलझे रहें और कभी अपने समाज की उन्नति के लिए एक मत होकर काम न करें! मनुवाद के षड्यंत्र से बाहर निकलने पर ही समाज की उन्नति होगी, कर्म-कांड मात्र सामाजिक-नाटक है इनपर अधिक चर्चा करना समय की बर्बादी है जो समय को बर्बाद करता है समय उसको बर्बाद कर देता है फिर चाहें वह व्यक्ति हो या समुदाय ! नमो-बुद्धाय, सबका मंगल हो !
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