बोधिसत्व और सम्यक सम्बुद्ध में अंतर ....

बोधिसत्व और सम्यक सम्बुद्ध में अंतर .... दो शब्द प्रयोग होते हैं! प्रथम बोधिसत्व दूसरा सम्यक सम्बुद्ध और बुद्ध ! बुद्ध वंशावली के अनुसार कई कल्पो में कोई सम्यक सम्बुद्ध होता है उस सम्यक सम्बुद्ध के साथ कई बुद्ध हो सकते हैं! बुद्ध स्वतंत्र रूप से भी उत्त्पन्न होते हैं! नास्तिकवादीयों के लिए मेरी बात स्वीकार करना कठिन होगा किन्तु आपने प्रश्न उठाया है तो मैं इसका उत्तर देने को बाध्य हूँ! बुद्ध वंशावली के अनुसार वह व्यक्ति अपने अनंत जन्मो तक सील का पालन करते हुए अपनी आत्मा को विकार विमुक्त करने का प्रयास करता हैं, अपने जिस अंतिम जन्म में वह आत्मा को विकार विमुक्त कर लेता है, उसका वह जन्म सम्यक सम्बुद्ध, बुद्ध या अरहंत का होता है! ऐसे व्यक्ति जो अपने अनंत जन्मो तक जनकल्याण के कार्य करता है तथा सामान्य जन से अधिक प्रतिभावान दिखता है ऐसे व्यक्ति को बुद्ध दर्शन में बोधिसत्व कहा जाता है! इसी आधार पर बाबा साहब को भी बोधिसत्व कहा जाता है! कुछ महाथेरो का मानना है कि बाबा साहब ही आने वाले सम्यक सम्बुद्ध है और अपनी पारमिताओ को पूरा कर रहे हैं! जिस प्रकार जन्म लिए व्यक्ति की सामान्य आयु 120 मानी जाती है उसी प्रकार बुद्ध दर्शन में उत्पन हुई आत्मा की न्यूनतम आयु 10 कल्प वर्ष मानी जाती है! बुद्धवंश के बारे में मेरा ज्ञान महाथेरो की संगत में मिला है इसकी प्रमाणिकता के बारे में अभी मैं कुछ नही कह सकता हूँ किन्तु इंकार भी नही कर सकता हूँ ! परलोक-चर्चा Daun Gautam मित्र आप की चिंता उचित है, उद्योग में काम करने वाले संगठनों के नेता कर्मचारीयों के हितो तक सीमित होते हैं जबकि राजनीति करने वाले सम्पूर्ण देश की नीति के लिए काम करते हैं! मैंने कई बार कहा है आज फिर कह देता हूँ बाबा साहब का एक काम बुद्ध धम्म ग्रहण करने से पहले का है जो राजनीति में रुचि रखने वाले ही कर सकेगें दूसरा धम्म ग्रहण के बाद का है वह केवल भिक्षु ही कर सकेगें! आंबेडकरवादी राजनीतिक पार्टियों को धर्म-अधर्म पर चर्चा करने से बचना चाहिए! सम्राट अशोक ने भी जब धम्म-प्रचार का काम किया था तो उसके लिए भिक्षुओ को भेजा था, सैनिको को नही! राजनीति के सैनिक धम्म की चर्चा न करें ! लोक-ज्ञान और परलोक-ज्ञान दोनों अलग-अलग महत्त्व रखते हैं! संयोग से मुझे दोनों को निकट से देखने का अवसर मिला है! पाखंड भी बुरा नही है क्योंकि मूढ़ बौधिक प्रश्नों पर कुतर्क के साथ अड़ जाता है और फजीहत करने लगता है ऐसे को कर्म-कंडों में उलझा देना ही उपयुक्त उपचार है और ऐसा किया भी गया है! मूढ़ को दिया गया उपचार परम्परा बन गया और परम्परा पाखंड बन गयी उपचार का मूल-भाव तो विलुप्त ही हो गया है! नास्तिक उपचार की जर-जर हो चुकी खूंटियो से लटके रहते हैं तथा हो-हल्ला करते रहते हैं! इसमें समय ख़राब करना उचित नहीं है इससे समाज को कोई लाभ नही होता है! अंधे-के साथ रंगों की चर्चा नही की जा सकती! परलोक की बाते छठी इन्द्रिय की बाते हैं जिसको इसकी प्रथक पहचान नही हुई उससे चर्चा असंभव है! उदाहरण जिसका जनांग विकसित नही हुआ उसके लिए लिंग मात्र मूत्र-विसर्जन का अंग है इसी प्रकार मन और आत्मा को जो व्यक्ति अलग-अलग नही देख लेता उससे परलोक की चर्चा नही की जा सकती है! मैं आपके लेख के विरोधा भाषो से सहमत हूँ! विपश्यना संस्थान द्वारा चलाये जा रहे पाली-पाठ्यक्रम में अध्यायन के दौरान मुझे भी ऐसे ही संदेह उत्पन्न हुए थे किन्तु ज्यो-ज्यों साधना गहन होती गयी त्यों-त्यों तिपिटक की उपयोगिता कम होती चली गयी अब मैं पाली-भाषा और लेखन की त्रुटियों में नही उलझता बल्कि आर्य अष्टांगिक मार्ग के रसपान करता हूँ !

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