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Showing posts from 2021

यादवो की मूर्खताएं

​ @Alok Yadav इस तरह से परिभाषित करना ठीक न होगा ! विश्व सुन्दरी, मिस वार्ड, एयर होस्ट्स, होटल सर्विस के आलावा रेड एरिया आदि काल गर्ल में उच्च घरानों की औरते होती हैं! कुछ जन-जातियां जो हारे हुए क्षत्रियों की जंगल में भाग गयी औरते हैं ने कालांतर में देह-व्यापर के धंधे में खुद को संलग्न कर लिया ! कुछ स्त्रियों का शोषण करके राजवाड़ों ने अपने पास रख लिया कालांतर में उनकी संतानों को अलग जाति का नाम दे दिया गया ! वे अस्प्रश्य जातियां नही थी आगे भी उनकी सेवा राजा और रजवाड़े लेते रहे उन सभी से देह व्यापर कराया जाता रहा! उन्ही में से अधिकांश को देव-दासी बनाया जाता था ! अस्प्रश्या जातियां देह व्यापर में नही हैं बल्कि वे जहाँ पर है कमजोर हालत में है जातिगत दुर्भावना से उनका शोषण किया जाता है और बंधुआ मजदूरी कराई जाती है ! यादव जी आप अपने को कृष्णवंशी कहना तो छोड़ दो, क्योकि कृष्ण वंश तो कृष्ण के रहते ही गांधारी के श्राप से समाप्त हो गया था ! आप वे ग्वाला हैं जो राजा और रजवाड़ो ने अपने पशुओं की देखभाल के लिए रखा था ! आप यदु-वंशीय नही हैं झूठे अहंकार में फसकर आरएसएस का भला करोगे और ८५% का नुकसान ! ...

नास्तिक

नास्तिक Sonu Mandawariya मित्र मेरी पोस्ट तो देखते होगे ! मेरे से आंबेडकरवादी भी परेशान रहते हैं, बौधिष्ट भी, सनातनी और आर्यसमाजी हिन्दू भी, वे समझ ही नही पाते हैं कि यह ऊँट किस करवट बैठेगा और यह ऊँट किस धर्म का है ? नास्तिक वह है जो ठोक-बजाकर देखता है जो सत्य लगता है स्वीकार करता है अन्यथा त्याग देता है! किसी राजनीतिक गुटबाजी में नहीं पड़ता है! Sunder Lal Sagar मित्र पञ्च तत्व की बात पर ही अटके हो ? छठे तत्व की बात क्यों नही करते जिस पर सम्पूर्ण ज्योतिष विज्ञान (खगोल विज्ञान : ग्रहों की पारस्परिक गति और रेडीएशन ) चलता है ! बुद्ध तो केवल चार तत्वों की ही बात करते हैं क्योकि पञ्च इन्द्रीय बाले पांचवे और छठवे तत्व की अनुभूति ही नहीं कर सकते हैं इसलिए वह इस विषय को केवल श्रोतापन्न(भंगी), सक्दागामी, अनागामी के साथ ही चर्चा करते हैं! अरहंत तो इस चर्चा से भी मुक्त होता है! मैंने तो भगवान की बात की है जो शास्वत और शाब्दिक है अकाट्य-सत्य है जो इसे स्वीकार न करे वह नाबालिग है बुद्धि हीन है!

कौन है भंगी ?

कौन है भंगी ? भंगी शब्द का शाब्दिक अर्थ सफाई करने बाला/या गन्दा रहने बाला कैसे हो गया मेरी समझ नहीं आता है? भंग से भंगी शब्द बना है अर्थात भंग को प्राप्त साधक, भंग साधना की वह अवस्था है जिसमें साधक को अपने शरीर की सूक्ष्म कोशिकाओ की हरकतों का बोध होने लगता है इस अवस्था को भंग कहा जाता है जो साधक इस अवस्था को प्राप्त कर लेता है वही भंगी है! जो भंगी है वह मानसिक विकारो से विमुक्त (चित्त-विशुद्धि अर्थत राग, दोष और मोह से) हो जाता है बुद्ध दर्शन में इस अवस्था को श्रोतापन्न (भंगी) अवस्था कहा जाता है यह साधना का प्रथम फल है! मैं तो यही कहूँगा कि ब्राह्मण, ब्राह्मण न रहा, और भंगी, भंगी न रहा, दोनों पाखंडी हो गये ! मेरी नजर में, भंगी होना बहुत गौरव की बात है ! जाति श्रेष्ठता का दंभ भरना, यह एक ला-इलाज वीमारी है ! बाबा साहब ने इसी का इलाज बताया था "बेटी रोटी का सम्बन्ध" किन्तु उच्च शिक्षित मूर्खो ने मनुवादीयो की बेटियों से शादी करना आरम्भ कर दिया ! जिस दिन भारतीय संविधान ख़त्म करने में वे सफल हो जायेंगे उसी दिन शूद्र वर्ण में एक नयी जाति और जोड़ देंगे जो इन उच्च शिक्षितो की संकर संत...

मूढ़ता पूर्ण प्रश्न

Vinod Kumar मित्र आप फिर पोथी में पड़ गये ! क्यों 17 के चक्कर में पड़े हो, प्यास बुझाने के लिए एक बोतल पानी काफी है! अब अशोक किस कंपनी के पानी की बोतल प्रयोग करते थे इससे क्या फर्क पड़ता है ! वे पीते तो पानी ही थे अर्थात साधन की पद्दति का ही प्रयोग करते थे जो मोग्लिपुत्त सिखाते थे, जैसे आज भी किसी विश्व-विद्यालय में एक विषय के दर्जनों अध्यापको होते हैं और कई विश्विद्याल मिला दिए जाये तो सैकड़ो अध्यापक हो जाते हैं ! इससे क्या फर्क पड़ता है ? उस विषय का ज्ञान बदल तो नहीं जाता मेरे भाई ! फिर आप मूढ़ पंडितो के प्रश्नों में उलझ गए ! Vinod Kumar अंतर करना तो पंडितो का काम है, उनसे करा लो वे बौद्धों में भी जातियां बना देंगे ! आप पर भी मनुवादियों की संगत का असर आने लगा है, आप भी बिना अंतर किये स्वीकार ही नहीं कर सकते हैं ! वे बौद्ध शिक्षा के 17 विश्व-विद्यालय थे जिसमें से एक के कुलपति मोग्लिपुत्त थे ! Abhinder Gautam तिपिटक में कहाँ लिखा है भाई? महा-काश्यप को यही भय था कि पंडित अपनी विचारधारा को बुद्ध के मुंह से न कहला दें इसीलिए उन्होंने सम्पूर्ण बुद्ध वाणी का संगायन कराकर संकलित कर दिया था! बु...

चमार

Vinod Kumar आपको पता होगा, अंग्रेजो के समय जब बौद्धों की गिनती कराई गयी तो केवल कर्नाटक राज्य में मात्र १८ हजार बौध परिवार मिले थे अन्य किसी राज्य में बौद्ध नही पाये गये ! आज तमाम बौद्ध भिक्षु ब्राह्मण कुल से आते है इनकी धम्म में कोई आस्था नहीं है यह सिर्फ बुद्ध के नाम पर आने वाले दान को प्राप्त करने के लिए चीवर धारण किये हुए हैं इसलिए बाबा साहब ने नव बौद्धों के लिए 22 प्रतिज्ञाएँ दी हैं ! जो 22 प्रतिज्ञाएँ न करे उसे नव भिक्षु न मानें ! पंडित राहुल संक्रत्यान खुद ब्राह्मण कुल से हैं भिक्षु समाज उनको अपना अग्रणीय मानता है किन्तु क्या किसी ने खोज की है कि वे 22 प्रतिज्ञाएँ करते थे? इसीलिए मैंने अपनी एक पोस्ट में कहा है कि मेरा नाम चमार है और मैंने बौद्ध उपाधि धारण की है! आचार्य रजनीश ने अपनी खोज में यह सिद्ध किया है कि चमार मूलतः बौद्ध ही हैं ! Rajesh Achal ज्योतिष में ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र जातक का वर्ण है जोकि उसके गुण को दर्शाता है यह गुण जातक-उर्जा का 12 तारा-मंडल (राशियों) के साथ सम्बंधित है! इसका समज के जाति विभाजन से कोई सम्बन्ध नही है! दलितों और बौद्धों को इस षड्यं...

आत्मा की मृत्यु

आत्मा की मृत्यु भाई मेरे क्यों आत्मा के साथ उलझ रहे हो ? बुद्धिज्म के अनुसार आत्मा (चित्त) विकारो का बंधन है जो एक योनि से दूसरी दूसरी योनि में स्थानांतरित होता रहते है शरीर की निर्जरा हो जाने पर ! किन्तु जब विकारो की निर्जरा हो जाती है तो चित्त/आत्मा नाम की कोई चीज नही रहती है ! विपश्ना साधना वह विधि है जिससे चित्त विकार विमुक्त हो जाता है और आत्मा की ही मृत्यु हो जाती है ! Vinod Kumar मित्र आपका मेरे साथ इस विषय पर जिद्द करना हठधर्मिता है जिसका मेरे पास कोई इलाज नही है! दिल की धडकन और रक्त के बहने की अनुभूति यदि आप नही कर सकते हो, तो आत्मा की अनभूति कैसे करोगे ? अब यह मत कह देना कि आपके शरीर में कोई रक्त नही बहता है और न ही दिल धड़कता है! क्योंकि जड़ मनुष्य की पांच इन्द्रियां न तो दिल के धड़कने की अनुभूति कर पाती है और न ही रक्त के बहने की जबकि इन सब की अनुभूति किसी भी साधक के लिए सामन्य बात है ! Vinod Kumar मित्र "जिन खोजा तिन पयाणा"! अध्यात्मिक (निर्गुण-साधक) लोग ब्रेन का मात्र दर्शन ही नही करते बल्कि उसका भोग करते हैं मित्र उसकी एक-एक शिरा में रमण करते हैं ! आपको किसने...

प्रतिवाद

भगवान् बुद्ध की खोज मात्र इतनी है कि व्यक्ति को चित्त का दर्शन कैसे कराया जाये और इस कार्य में वे सफल भी हुए ! मित्र अगर भगवान बुद्ध का जोर सामाजिक मान्यताओ का गठन करना होता तो वे अपने मृत्यु संस्कार के बाद की परिस्थितियों के निदान के लिए एक ब्राह्मण पर छोड़ने का आनद को निर्देश न देते ! उनकी अस्थियो को आठ कलश में भर कर राजाओ को बाँट देने का कार्य तो एक ब्राह्मण ने ही किया था ! होली का विकृत रूप निंदनीय है परन्तु पहले यह तो जानो कि विकृति किसको कहा जाये ? जो किसी एक की मान्यता के अनुरूप नही है मात्र इस कारण से तो उसको निंदनीय नही कहा जा सकता है! बुद्ध दर्शन में चित्त विशुद्दी का अद्भुत ज्ञान संकलित है उस पर चर्चा कर धारण किया जाये तो कल्याणकरी ही होगा ! प्रतिवाद की खोज समय की वर्वादी है !

मृत्यु असंभव है .............

तुम अभी मर भी न पाओगे ............... इन्सान दो तत्वो से मिलकर बना है! बुद्ध दर्शन में इसे नाम-रूप कहा जाता है और वैदिक दर्शन में इसको शारीर और आत्मा कहा जाता है! शरीर (बुद्ध दर्शन के अनुसार रूप) का पुनः पुनः परिवर्तन होता है, आत्मा (बुद्ध दर्शन के अनुसार नाम) के लिये! तबतक-जबतक "आत्मा" अथवा "नाम" का निर्वाण नहीं हो जाता है शरीर मरकर भी नही मर पता है! वैदिक दर्शन कहता है आत्मा ब्रह्म में विलीन हो जाती है (अर्थात मुक्त हो जाती है) जबकि बौद्ध दर्शन कहता नाम का निर्वाण हो जाता है (अर्थात प्रकृति में विलीन हो जाना खो जाना) ! वैदिक दर्शन जिसे ब्रह्म कहता है बौद्ध दर्शन उसको प्रकृति कहता है! बिना मरे स्वर्ग नही मिलाता, जिन व्यक्तियों ने कभी अपने दिल की धड़कन न सुनी हो, उनको डाक्टर ही बताता हो कि तुमारा दिल धड़क रहा है तुम अभी जिन्दा हो! ऐसे लोगो को क्या अपने शरीर के अन्दर आत्मा की अनुभूति हो पायेगी यह एक प्रश्न चिन्ह है? धम्म में बुद्ध का मात्र इतना ही योगदान है कि उन्होंने वह विधि पुनः खोज निकाली जिससे कोई भी इच्छुक व्यक्ति अपने अन्दर विद्यमान आत्मा का साक्षात्कार कर सक...

ज्योतिष के अनुप्रयोग

ज्योतिष के अनुप्रयोग मित्र, ज्योतिष का शूद्र; जाति आधारित नही होता बल्कि जन्म आधारित होता है अर्थात शूद्रो की किसी जाति में जन्मा व्यक्ति जन्म लग्न के अनुसार ब्राह्मण क्षत्रिय और वैश्य गुण वाला भी हो सकता है! जैसे जन्म लग्न के अनुसार बाबा साहब और मायावती ब्राह्मण लग्न के हैं जबकि योगी आदित्यनाथ शूद्र लग्न का है! जन्म लग्न व्यक्ति के संभावित लक्षणों को दर्शाता है! अगर ध्यान से देखोगे तो पाओगे आदित्यनाथ के लक्षण शूद्र अर्थात राक्षसीय हैं जबकि मायावती और बाबा साहब के लक्षण ब्राहमण के हैं; किन्तु जाति के शूद्र इस विद्या को नही जानते हैं इसलिए जाति के ब्राह्मण वैश्य और क्षत्रिय उनका शोषण कर लेते हैं! इस विद्या को जानो यह प्रेक्षण पर आधारित है और भविष्य की संभावनाओ की घोषणा करता है! इसका भगवान से कोई लेना-देना नही है सीधा-सीधा वैज्ञानिक प्रेक्षणों के निष्कर्षो पर आधारित हैं! मिथुन तुला और कुम्भ लग्न वाले शूद्र होते हैं; वृषभ, कन्या और मकर लग्न वाले वैश्य; मेष, सिंह और धनु लग्न वाले क्षत्रिय तथा कर्क, वृश्चिक और मीन लग्न वाले ब्राह्मण लग्न वाले होते हैं! यह १२ लग्न राशियों के सामने से पृ...