आर्य-अष्टांगिक मार्ग पर चलने वाले को पुस्तक की जरूरत नही होती है!
आर्य-अष्टांगिक मार्ग पर चलने वाले को पुस्तक की जरूरत नही होती है!
Kuldeep Kumar पुस्तकों के ज्ञान को मैं आरम्भिक ज्ञान ही मानता हूँ किसी पुस्तक का ज्ञान अंतिम ज्ञान नही होता है! विपरीत विचारधारा की "एक ही विषय" पर पढ़ी गयी पुस्तकों से उत्पन्न विवेक ही दुतीय श्रेणी का ज्ञान होता है! अंतिम और श्रेष्ठतम ज्ञान वह है जो शून्य से प्रकट होता है! मैंने ब्राह्मण ग्रन्थ और गौर-ब्राह्मण ग्रन्थ पढ़े हैं! इसके बाद एक माइंडसेट बन गया है इसलिए अब मैं बहुत अधिक किताबो में उलझ कर अपना समय ख़राब नहीं करता ! हर पुस्तक में वही पुरानी बाते लिखी होती हैं! कुछ विराम और कामा लगाकर! भगवान बुद्ध ने साहित्यक बातो पर ज्यादा जोर नही दिया है उन्होंने तो भिखुओ को केवल आर्य-अष्टांगिक मार्ग पर चलने पर जोर दिया है! यह तो महाकश्यप की मुर्खता थी जो उन्होंने प्रथम संगीति करके बुद्ध वचनों को संकलित किया है ! अब भिक्षु बुद्ध वचनों को पढ़कर/रटकर खुद को थेर और महाथेर समझने लगा है! इस प्रकार के भिक्षु पुरोहितो के समान ही पाखंडी होते हैं उनके आचारण में धम्म की झलक तक नहीं होती है! बुद्ध की बहुत अधिक पुस्तके पढ़ने की जरूरत नही है! आर्य-अष्टांगिक मार्ग पर चलने की जरूरत है अध्यातम का समस्त ज्ञान शून्य से प्रकट होने लगेगा ! जिस प्रकार गौशाला में विचरण किये व्यक्ति को गाय का निबंध पढ़ने की आवश्यकता नहीं होती उसी प्रकार आर्य-अष्टांगिक मार्ग पर चलने बाले व्यक्ति को बुद्ध को समझने के लिये किसी पुस्तक की जरूरत नहीं पड़ती है !
Comments
Post a Comment