जाति हीनता की ग्रंथि --
जाति हीनता की ग्रंथि --
जाति की हीनता का भाव हमारे अन्दर होता है! मेरे एक आंबेडकरवादी मित्र हैं, उनको अपना नाम सुनकर हीनता का वोध होता है! उनका नाम कृष्ण कुमार है कोई उन्हें उनके नाम से बुला दे तो झगड़ा कर लेते हैं, वे कहते हैं कि उनको केवल के.के. कहा जाये! हीनता की ग्रंथि व्यक्ति के अन्दर होती है! ध्यान साधना करके पहले इस ग्रंथि को जलाना होगा तब चित्त का दोष दूर होगा! अगर सामान जाति वाले दुसरे को कमरा नही देते तो उनमें तो जातिगत हीनता नही आती ! मेरे पिताजी पुलिस वालो और बकीलो को कमरा नही देते थे ! यह उनके अन्दर की हीनता की ग्रंथि है कोई दूसरा व्यक्ति पहले की हीनता ग्रंथि से क्यों प्रभावित होता है? और अपनी हीनता को क्यों बढ़ता है! जहाँ मौका मिले दौड़ते जाओ, दौड़ ही दलितों को आगे निकालेगी! दौड़ प्रतियोगिता में तो मित्र भी दुश्मन की तरह व्यवहार करता है! फिर भी कहा जाता है खेल संस्कृतिक मेल-जोल का उपक्रम है! अपनी हीनता की ग्रंथि को त्यागो किसी दुसरे की हीनता की गर्न्थी से अपनी हीनता की ग्रंथि को उर्जा मत दो ! ध्यान साधना करके पहले इस ग्रंथि को जलाना होगा तब चित्त का दोष दूर होगा!
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