दलित समाज की प्रतिष्ठा में बाधाएं भाग - १
ABCD - बात छेड़ी है तो अंजाम तक पहुंचा ही दो ! रहिशो के पारिवारिक केसो के लिए बने कानून गरीबो पर क्यों थोपे जाएँ ? रहीश के झगड़े अकूत सम्पत्ति के बंटबारे के लिए होते हैं जबकि गरीब की संपत्ति जीवन-निर्वाह से भी कम होती है! और उसके लिए कोर्ट-कचेहरी में कई दसको तक मुकदमा क्यों लड़ा जाये? जो जज होते हैं उन्हें गरीबी का पता नही, और जो हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट तक मुक़दमे लेकर जाते हैं उनके पास भी संपत्ति की कमी नही होती है! इस झगड़े में दलित क्यों पड़े? दलितों को अपने पारिवारिक कानून अलग से बनाने पड़ेंगे! संविधान का अनुच्छेद 35( ए) इसी बात का संरक्षण करता है उसके लिये पहले दलितों को अपने समाज की घोषणा करनी पड़ेगी उसके बाद वे अपने संस्कृतिक कानून बना सकते हैं! दलित समाज को बुलंदियों तक पहुँचाना है तो परिवार नाम की इकाई को मजबूत करना होगा इसके साथ ही न्याय-पालिका पर भी दलित समाज की निर्भरता कम करनी होगी! दहेज़ की समस्या का विकराल रूप अभिजात्य वर्ग में है, सवर्ण समाज में है! दलित समाज उसका रोना क्यों रोये? दूसरी बात जो आपने उठाई है कि बेटियां बेटों से ज्यादा सेवा करती हैं! तो अच्छी बात है सामाजिक ढांचा बदल लीजिये बहु की विदाई नही होगी दामाद की विदाई होगी ! ऐसा बहुत से देशों और जातियों में है लेकिन जो भी हो साफ-सुथरा हो ! युवाओ की जिन्दगी तहस-नहस करके यह निर्णय मत लीजिए ! विवाह के समय ही निर्धारित कर लीजिये ! विवाह के बाद बनने वाला परिवार महिला प्रधान होगा या पुरुष प्रधान (लड़की का विवाह करके बेटी को अपने साथ रखने के लिए बेटी और दामाद में झगड़ा करते रहना जघन्य अपराध है) ! जो माँ-बाप लडकी की शादी करने के बाद लडकी की ससुराल और बेडरूम में झांकते रहते हैं उनकी बेटी कभी सुखी नहीं हो सकती और ऐसे माँ-बाप को बहु कभी अच्छी नही लगेगी! इसलिए परम-पराएँ बनायीं गयीं थी की बेटी की ससुराल का पानी तक नही पीना है ! किन्तु .... ... तो मित्र न दहेज़ बुरा है न संपत्ति में महिलाओ का हक़ परन्तु पहले संपत्ति तो होनी चाहिए! लोग बेटी के लिए डाक्टर इन्गीनियर अधिकारी दामाद खरीदते हैं ! बेटी को ऐसे गुण नही सिखाते कि उनका दामाद डॉक्टर इंजीनियर और अधिकारी बन सके ! शादी होते ही इतना कलेश भर दिया जाता है कि पढाई रुक जाती है! मित्र आप को तो पता है तैयार माल की कीमत ज्यादा होती है तो दहेज़ देने में तकलीफ क्यों ? मैंने दलित समाज में आज तक नहीं देखा कोई काम-काजी लडकी बेरोजगार लड़के से शादी कर ले या कोई बाप अपनी काम-काजी लडकी की शादी बे-रोजगार लड़के से कर दे जबकि सवर्ण समाज में मैंने कई उधारण देखे हैं इसलिए जब तक दलित समाज अपने परिवारों को पुनर्गठित और परिष्कृत नहीं करता दलित समाज को प्रतिष्ठित होने में बहुत दिक्कते आएंगी !
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