Posts

Showing posts from July, 2020

आर्य समाज और मनुवाद

आर्य समाज और मनुवाद  जिस प्रकार दबंग कहा जाता है तो उसमे कोई एक व्यक्ति का बोध नही होता है बल्कि एक जैसी विचारधारा के लोग होते हैं जो दूसरे समाज को अकारण ही उत्पीडित और परेशान करते रहते हैं यह गैर-शासकीय आतंकवादी होते हैं! इसी प्रकार शासकीय आतंकवादी भी हुए हैं जो शूद्र वर्ग के लोगो को सताने परेशान करने उनका धन छीनने तथा शिक्षा से वंचित करने के लिए महामंत्री की सलाह पर जो कार्य किया करते थे उसे मनुवाद कहते हैं! विभिन्न राज्यों में उनके मंत्रियो द्वारा लिखी गयी स्मृतियों में शूद्र के शोषण की विधियाँ संकलित है जोकि मनु महाराज के काल में बनी भ्रंगु-संहिता से मिलता-जुलता ही है! इसमें दर्जनों सहिंताए हैं जो शूद्र वर्ग(श्रमिक) को उत्पीड़ित करने और सताने के लिए समकालीन राजाओ द्वारा उनके मंत्रियो की सलाह पर लागू की जाती रही हैं सामान्यतः उनके मंत्री ब्राह्मण कुल से आये पुरोहित होते थे जोकि अत्यंत महत्वकांक्षी और लोभी होते थे! ब्राह्मण कुल से आने के कारण राजा इनको सम्मान देता था किन्तु यह मात्र पुरोहित ही होते थे इनको ब्रह्म-विद्या की कोई अनुभूति नही होती थी किन्तु यह ब्राह्मण के तुल्य सम्मा...

आंबेडकर ही रामचंद्र हैं

आंबेडकर ही रामचंद्र हैं ब्राह्मणवादियों को खुश कर रहा हूँ कि बाबा साहब के रूप में विष्णु ने ११वां अवतार लेकर शूद्रो के कल्याण का विधान देकर अपनी भूल में सुधार किया है! जैसाकि त्रेता में बाली को छिपकर मारने की जो भूल रामचंद्र ने की थी उसका सुधार द्वापर में कृष्ण ने बहेलिये का तीर खा कर की थी ! उसी प्रकार सम्बूक ऋषि के वध की जो भूल रामचंद्र ने त्रेता में की थी उसी का सुधार कलयुग बाबा साहब के रूप में का जन्म लेकर शूद्र शिक्षा का विधान देकर भूल-सुधार की है इसलिए बाबा साहब राम और कृष्ण के सामान ही पूजनीय हैं! साकेत में बाबा साहब की मूर्ति रामलला के स्थान पर लगनी चाहिए !

रामचंद्र इतिहासिक हैं अथवा नही हैं?

रामचंद्र इतिहासिक हैं अथवा नही हैं? मित्र यह विषय इतने महत्व का नही है कि राम पैदा हुए, कि नही हुए है परन्तु उस पुस्तक के पात्र का चित्रांकन जीवंत है उसे नाकारा नहीं जा सकता अन्यथा दलित समाज द्वारा ब्राह्मणों पर लगाये गए समस्त आरोप निराधार हो जायेंगे! अगर आज आरएसएस रामचंद्र को काल्पनिक कहे तो भी दलित राजनीति को रामचंद्र को इतिहासिक रूप से जीवित रखना पड़ेगा यह दलित राजनीति का आवश्यक तत्व है! जिस प्रकार राममंदिर-बाबरी मस्जिद विवाद हिन्दू राजनीति का आवश्यक तत्व था उसी प्रकार दलित राजनीति को सत्ता के शिखर तक पहुँचने के लिए रामचंद्र को इतिहासिक स्वीकार करना और दलित समाज को स्वीकार कराना पड़ेगा, तभी जनमत का ध्रुवी कारण होगा! काल्पनिक तो ब्रह्मा विष्णु और महेश भी हैं किन्तु वे सब अवतार के रूप में स्थापित कर दिये गए हैं उसी प्रकार रामचंद्र को भी इतिहासिक और दलित समाज के लिए अत्याचारी राजा के रूप में स्थापित करना पड़ेगा तथा बहुसंख्यक समाज में में यह स्थापित करना पड़ेगा कि रामचंद्र के अनुयायी आज तक दलित विरोधी और हिंसक हैं जिस प्रकार भाजपा रामचंद की सीढ़ी पकड़ कर सत्ता के शीर्ष तक पहुंची है दलित राजनी...

लाला

मित्र लाला का होना ही गलत है, श्रम के घंटे से अधिक काम लेना, सम्मानित-वेतन न देना तथा विकास की संभावना को मार देना अपराध होना चाहिए!

दलित शब्द का अर्थ

आजाद भारत मैं कई बार कह चुका हूँ कि शब्दों के अपने कोई अर्थ नहीं होते, समाज उनमें अर्थ डालता था/है जोकि परम्परा बन जाते हैं कई बार तो शब्द अपना सार्भौमिक अर्थ छोड़ देते हैं और एकाकी हो जाते हैं! दलित शब्द का अर्थ आज अनुसूचित जाति और अनुसूचित जन जाति के लोगो से लिया जाता है! क्योकि आज तक इनका पूरा समाज समानता के स्तर तक नही पहुँचने दिया गया है ! अगर दलित शब्द के सार्भौमिक अर्थ के बारे में कहा जाये तो वह व्यक्ति/समाज जो आर्थिक, संस्कृतिक और शारीरिक रूप से कमजोर हों जिसका समाज में स्तर निम्न कोटि का समझा जाता हो!

लेखक की मजबूरी

Arya Prajapati Parsa Ram आप मुझसे काफी समय से जुड़े हैं, मेरी पोस्ट को भी आप ध्यान से पढ़ते हैं और संतुलित प्रतिक्रिया भी देते हैं यह अच्छी बात है, लेखन का कार्य बहुत ही चतुराई पूर्ण कार्य है! मनुवादी ब्राह्मण बहुत सजग रहते हैं वे अपने विरुद्ध कोई तार्किक किताब बाजार में आने ही नही देते हैं और किसी मनुवादी प्रकाशन से कोई ऐसी पुस्तक बाजार में नही भेजी जाती है जिसके वितरण पर सरकार या न्याय-पालिका कोई प्रतिवंध लगाये! मैं तो आपकी समझ को परखना चाह रहा था ! मेरा डॉ. सुरेन्द्र से क्या लेना-देना? उनकी पुस्तक पढ़कर आपकी जो समझ बनी है, मुझे तो उसका भंजन करना हैं, आप उनके सबसे उत्तम श्लोक से आरम्भ करो मैं वहीं से भंजन आरम्भ करूँगा! मेरी लगभग ४०० किलो पुस्तकें बाबा रामदेव के यहाँ सेवाव्रती प्रकल्प में छुट गयीं/ या यूं कह लो छिन गयीं है जिनमे मनुस्मृति भी थी शायद गीता प्रकाशन की ! गीता प्रकाश से अच्छा तो कोई प्रकाशन हिंदूओ में नहीं है! अब अब आप बताओ अप किस प्रकाशन की पुस्तक पढ़ रहे हैं! सारा खेल तो प्रकाशन में होता है, क्या बताया जाये और क्या छिपाया जाये क्योकि पुस्तक की मार्केटिंग तो प्रकाशन को करनी...

भक्ति-भजन है या कायरता ?

भक्ति-भजन है या कायरता ? भक्तिमार्ग/भक्ति-भजन का उदय कायरता की परकाष्ठ थी जो मुस्लिम काल में उत्पन्न हुई थी इसमें मुस्लिमो को लगने लगा था भक्तिमार्ग/भक्ति-भजन से लगे लोगो से उनके राज्य को कोई खतरा नहीं है इसलिए उन्होंने इसको प्रोत्साहित किया उसके परिणाम सरूप मुस्लिमो में भी भक्तो की एक शाखा उत्पन्न हो गयी जिसे फ़कीर/(.........) कहते हैं! भक्ति-भजन ऋग्वेद की रिचाओ से ही मिलती जुलती प्राथनाएं है उस समय भी वैदिक संस्कृति के लोगो को अनार्यो का भय सताता था तो वे अपना अधिकतम समय भक्ति-भजन में गुजार कर अपने को मानसिक रूप से शांत करते थे! मोदी के शासन काल में हिन्दुओ ने जो आतंक मचा रखा है इसकी प्रतिक्रिया सन २०२५ में दिखने लगेगी तब भी आपको सभी मनुवादी भक्ति-भजन में ही नजर आयेंगे! भक्त को मार्ग की जरूरत नही होती, ध्यानी को मार्ग की जरूरत होती है कि किस विधि पाए ! साहित्यकारों को भक्ति-मार्ग नही, भक्ति-भजन कहना चाहिए!

आरएसएस का सच

जी#Racial_Secret_Service( RSS ) प्रजातीय रहस्यमय क्रम-व्यवस्था 🐍  RSS का असली नाम रेसियल सीक्रेट सर्विस है | राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ नहीं | 🐍  RSS की स्थापना इजराइली यहुदी मूल के चितपावन ब्राह्मणों नी की है | 🐍  RSS में ज्यादातर सरसंघचालक चितपावन ब्राह्मण ही होते आए हैं | रिसर्च के अनुसार इन ब्राह्मणों का DNA 99.90% बेने इज़राइली यहूदियों से मिलता है | 🐍  RSS आज भी अमेरिका की आतंकवादी लीस्ट में शामिल है | 🐍  RSS ने अपने कार्यालय पर तिरंगा झंडा लहराना 52 वर्षो के बाद शुरु किया है, इसका असली नाम रेसियल सीक्रेट सर्विस था | 🐍  RSS का आज़ादी के आंदोलन से कोई सरोकार नहीं है । 🐍  RSS ने देश जब 15 अगस्त को आजाद हुआ तब इसने स्वाधीनता दिवस मनाने से इंकार किया था और 1947 से लेकर 2002 तक नागपुर मुख्यालय पर तिरंगा कभी नहीं फहराया। 🐍  RSS ने वर्ष 2002 के बाद बॉम्बे हाई कोर्ट के आदेश के बाद तिरंगा फहराया गया 🐍  RSS पर सरदार पटेल ने प्रतिबन्ध (बैन) इसीलिए लगाया था, क्योंकि बैन हटाने के लिए उसने जो हलफनामा दिया था उसमे निम्नलिखित मुख्य बातें थी :-- ...

shubh kamna

तो करते रहिए मन के प्रवाह को रोकना नही चाहिए जो व्यक्ति अपने मन के प्रवाह को रोक लेता है उसमें अहंकार जागने लगता है जिस कारण उस व्यक्ति की सरलता चली जाती है और शरीर का आकर्षण भी चला जाता है! शरीर का वात्सल्य समाप्त होते ही शरीर रोगों का घर हो जाता है इसलिए जिस चीज की जैसी अनुभूति हो बच्चों की तरह कह देना चाहिए तभी तो कहा जाता है "बच्चे बूढ़े एक समान"! अत्यंत सरलता की यही पहचान है! बूढों की सरलता किशोरों-युवाओ और प्रौढ़ के लिए मार्ग दर्शन का काम भी करती है अगर उसमें प्रपंच नही होता है तो ! प्रभु से प्रार्थना है आप दीर्घ आयु हो और बच्चो के सामान ही सबके ह्रदय स्पर्शी भी हों ! सबका मंगल हो कल्याण हो !

बाबा साहब भगवान हैं अथवा नही हैं ?

बाबा साहब भगवान हैं अथवा नही हैं ? Vipin Kumar Payasi आपके दो प्रश्न हैं मित्र, १. इन्सान मरता है २. भगवान नही मरता है! इसी सिद्धांत को आगे बढ़ाएं तो न राम जीवित हैं न कृष्ण, ओके ! दर्शन शास्त्र के अनुसार शरीर मरता है आत्मा अमर है! यह अमर आत्मा देव की भी अमर है और दानव की भी अमर है! कोई व्यक्ति अपने कर्मो के आधार पर देव और दानव बनता है ओके ! हिन्दू दर्शन के अनुसार राम की आत्मा भी अमर है और कृष्ण की भी, हो सकता है दोनों की एक हो ! अपने अच्छे कर्मो के कारण वे देव कुल(अथवा लोक) में होंगे! कोई भी हिन्दू दार्शनिक यह दावा नही कर सका है कि बाबा साहब नरक लोक में हैं या मुक्त हो गए हैं! हिन्दू दर्शन के अनुसार आत्मा ब्रह्म में विलीन हो जाती है वो भी केवल पुन्य आत्मा ! हिन्दू धर्म में कतिपय देवी-देवता है जो सामान्य बोल चाल में अपने कल्याणकारी कार्यो के कारण भगवान कहे जाते हैं ! बाबा साहब ने भारत को उस समय संविधान दिया जब किसी अन्य पर कोई सहमति नही बन पाई थी ! इसे विधि का विधान ही क्यों न कहा जाये कि एक शुद्र को संविधान लिखने का मौका मिला और उसने हजारो वर्षो से उत्पीडित लोगो के कल्याण का प्राविधान ...

धम्म-सुझाव

अति सुन्दर! ज्ञानी को कहने की जरूरत क्या है और अज्ञानी समझेगा क्या? ध्यान के समय शरीर में जो उथल-पुथल होती है उसको देखकर मूर्खो ने प्राणायाम बना दिया! इतनी गंभीर चर्चा करेंगे तो मूर्खजन उसको बुद्ध का नीतिशास्त्र बना देंगे और खुद को विद्वान कहने लगेगें! इसलिए भगवान बुद्ध अध्यानी व्यक्तियों से कोई धम्म चर्चा ही नही करते थे केवल सील की बात करते थे! जिसका सील पुष्ट नही है वह वाणी विलास में उलझ कर अपनी बहुत बड़ी हानि कर लेगा! मित्र मूढ़जन पर करुणा करो! जिन्हें पञ्च विकार की अनुभूति नही है उनसे सप्तबोझंग की चर्चा करना या चार ध्यानो की चर्चा करना अनुचित है! गुरु गोयन्का जी ने ऐसी वाणी विलास की पुस्तकों पर अपने जीवन काल में ही रोक लगा दी थी! जो गलती महाकश्यप ने की आप उसकी पुनरावृत्ति न करें! तिपिटक के संकलन से तिपिटक-पाठी पैदा हो गये और खुद को बुद्ध-वादी और बुद्ध ज्ञानी कहने लगे ! भिक्षुओ में अरहंत होना बंद हो गए इसलिए बुद्ध की ध्यान पद्दति भारत से नष्ट हो गयी! अगर साकेत में एक भी अरहंत होता तो भिक्षुओ के यूँ सिर काट कर कोई सरयू में न बहा पाता! मित्र करुणा करो, ध्यान करते हो तो धम्म तरंगे विखेर...

धम्म

धम्म : वर्तमान समय मैं बुद्धघोष की पुस्तक "विशुद्धिमग्ग" पर आधारित आधुनिक विपस्सना क्रांति, जिसे थाईलैंड के अजाहन सोबिन एस नामटो, वर्मा एवं वर्मिज परम्परा के सियाडो उ तेजानिया तथा पश्चिमी देशों के क्रिस्टोफर टिटमस इत्यादि विपस्सना शिक्षक, विश्व स्तर पर चला रहे हैं। इनके सन्दर्भ में एक स्वाभाविक प्रश्न लोग उठाते हैं कि यह आधुनिक विपस्सना विधि भारतीय गौतमबुद्ध की मौलिक शिक्षा (original teaching) ही है या उससे अलग की विधि है? इसके उत्तर में निर्विवाद, निःसंदेह एवं निःसंकोच होकर कहा जा सकता है कि यह शाक्य मुनि गौतमबुद्ध की मौलिक शिक्षा के अनुरूप नहीं है। संयोगवश बुद्धघोष का जन्म भारत में ही गौतमबुद्ध के परिनिर्वाण के लगभग 1000 वर्ष के बाद हुआ है और "विशुद्धिमग्ग" बुद्ध के मूल सुत्त नहीं अपितु गौतमबुद्ध के सुत्त पर भाष्य या कमेंट्री तथा कई नयी बातों (जिसका गौतमबुद्ध ने अपने सुत्त में कभी उल्लेख ही नहीं किया) का संकलन मात्र है ।अतः भारतीय गौतमबुद्ध की मौलिक विपस्सना विधि या विदस्सना विधि या इनसाइट मेडिटेशन तथा आधुनिक विपस्सना विधि में अन्तर पाया जाना स्वाभाविक है। शाक्य म...

ध्यान विधि विपश्यना

ध्यान विधि विपश्यना  जब बुद्ध को किताबो में धर्म नही मिला तो उनकी जूठन को जिसने उगला फिर दूसरे ने खाया फिर पलटी की उस पलटी को तीसरे ने खाया, फिर पलटी की , फिर उस पलटी को चौथे ने खाया .... इस तरह २५०० साल गुजर गए अब जिसने इस पुस्तक को लिखा और जो उसको चाट रहें है बड़ी विडंबना है कि उनको धर्म मिल गया है! बुद्ध को शिक्षा देने के लिए कपिलवस्तु सहित विश्व के प्रकांड विद्धवान उपस्थित थे तब भी पढ़ने और सुनने से बुद्ध(गौतम) को धर्म नही मिला ! यह पढ़ने और सुनने से मिलाता ही नही है! पढ़ने और सुनने से श्रुतमयी प्रज्ञा जगती है! ध्यान में बैठते ही चिंतनमय प्रज्ञा जगती है! गहन ध्यान में चिन्तनमयी प्रज्ञा समाप्त हो जाती है और इससे प्रत्यक्ष अनुभूति होती है, ब्रहमांड में घटित समस्त घटनाओ की! इस घटना को स्थिति-प्रज्ञ कहते है, जो केवल छठी इन्द्रीय से देखी जाती है या यूं कहलो समस्त पञ्च इन्द्रियां अपने दिव्य सरूप में होती हैं! इसलिए मित्र बार-बार कहता हूँ अध्यात्म के विषय की समस्त पुस्तको में आग लगा दो क्योकि किताबो से बोधि(अनुभूति) नही जगती केवल बुद्धि(साहितिक ज्ञान) जगता है! रसगुल्ले की किताबे पढ़कर कि...

"अम्बेडकरवाद" और "कट्टर आंबेडकरवाद" में अंतर

"अम्बेडकरवाद" और "कट्टर आंबेडकरवाद" में अंतर मित्र आप का प्रश्न सरल नही है, बहुत सूक्ष्म अंतर है "अम्बेडकरवाद" और "कट्टर अम्बेडकरवाद" में! "कट्टर आंबेडकरवाद" अँधा साड़ हैं! कट्टर हिन्दूवाद से भारतीय सभ्यता संस्कृति में प्रेम और भाई-चारे की हानि हुई है उसी प्रकार "कट्टर आंबेडकरवाद" आत्म-घाती है! कट्टर अम्बेडकरवादी बहुजनो को कभी सुसंगठित नही होने देंगे, इस कारण "आंबेडकरवाद" कभी सफल न हो पायेगा पाखंडवाद की जड़ें बहुत गहरी हैं इसमें अम्बेडकरवादीयों को उलझना ही नहीं चाहिए यह उनका विषय नही है! अम्बेडकरवादियों को केवल राजनीतिक काम करना चाहिये! पाखंड-वाद को ख़त्म करने का काम बाबा साहब ने बौध भिक्षुओ को दिया है! समाज में ऐसे भिक्षु होने चाहिए जो केवल धम्म का प्रचार-प्रसार करें! हिंदूं पाखंड के विरोध का नही क्योकि जब धम्म का प्रकास फैलेगा तो पाखंड का अंधकार अपने आप समाप्त हो जायेगा किन्तु हमारे समाज में अभी ऐसे भिक्षु नहीं हैं जो केवल धम्म की चर्चा कर सकें! भिक्षु केवल हिंदूओ की निंदा करते हैं जिस कारण उनका अष्ठ-शील खंडित होता ह...

दान दया और दीनता

आप भी उलझो भाई, जिस समाज में दान की परम्परा होती है उसी समाज में रक्षक होते हैं, जिस समाज में रक्षक होते हैं वही समाज जगत में प्रतिष्ठित होता है इसलिए अपने समाज की प्रतिष्ठा के लिए दान का सही रूप में पालन करें कहीं दान दया न हो जाये! जिस समाज में दान दया के भाव से दिया जाता है वहां दीनता फैलती है !

जय भोलेनाथ

जय भोलेनाथ  भाई बहुजन के साथ चलने में ही भलाई है! वर्ना वे लोग हम-आपको पागल घोषित कर देंगे और किनारा कर लेंगे इसलिए जोर से बोलो जय भोलेनाथ! ब्राह्मणी कहानियो के अनुसार भोलेनाथ अनार्यो के आराध्य देव हैं जिन्होंने विष्णु को कई बार घुटने टेकने पर मजबूर कर दिया ! कुछ तो समझो भाई ! ब्राह्मण(मनुवादी) जिसे मिटा नही पाता है उसे अपना घोषित कर देता है! भगवान बुद्ध को विष्णु का दसवां अवतार बताकर उनकी विरासत पर कब्ज़ा कर लिया! ग्वाले कृष्ण को विष्णु का अवतार बताकर पूरे बहुजन समाज को मूर्ख बनाये हुए है! संत रैदास को पूर्व जन्म में ब्राह्मण बताकर काशी क्षेत्र के चमार समज से मिटा दिया! पटेल पर कब्ज़ा करके कांग्रेस को मिटाने बाला है! संविधान के सामने सिर झुकाकर अम्बेडकरवाद को समाप्त कर दिया है! आज आंबेडकरवाद की जो शाखा है वह कट्टर आंबेडकर बाद है जोकि कट्टर हिन्दूवाद का ही प्रतिविम्ब है! कट्टर हिंदूओ की तरह ही वह मंदबुद्धि का विवेक हीन है! कल को मनुवादी आंबेडकर पर भी षड्यंत्र पूर्वक कब्ज़ा कर लें, (जोकि ७५% हो चूका है क्योकि देश में दलितों का आर्थिक, सामाजिक और राजनीतिक शोषण संविधान की सीमाओ में रह क...

जाति धर्म और वर्ण

जाति धर्म और वर्ण  मित्र सिमित शब्दों में इतना ही कहा जा सकता था वह मैंने कह दिया! (१) पिछले ७० सालो से दलितों को हिन्दू कहा जाता था, क्या किसी ने विरोध किया है? सिक्ख, बौध, और जैन, हिन्दू विधि से नयायालय में पारवारिक और सम्पति के विवाद लाते रहें हैं क्या कभी किसी ने विरोध किया है? किसी का धर्म क्या होगा यह राजनीति निर्धारित करती है! कोई भी व्यक्ति धर्म से मुक्त नही हो सकता है, राजनीतिक उन्माद के कारण! (२) आरक्षण जीवित है तो जाति बतानी ही होगी और जाति, कुल से ही निर्धारित होती है कि वह व्यक्ति किस कुल से आता है! (३) अब रह गयी बात वर्ण की तो यह ज्योतिष से निर्धारित होती है! आज ज्योतिष कोई गुप्त ज्ञान नही है! २०-२५ घंटे में पूरी ज्योतिष सीख सकते हो यूं-ट्यूब के माध्यम से! इसमें मात्र जन्म का स्थान और जन्म का समय प्रयोग किया जाता है! जातक के जन्म के साथ ही उसका वर्ण निर्धारित होता है! दुष्ट पुरोहित शूद्र जातियों में जन्मे बच्चे के माँ-बाप को बच्चे का सही वर्ण नही बताते थे इस कारण बच्चा बड़ा होकर बगावत कर जाता था/है ! आज की भाषा में कहूँ तो वर्ण का मतलब मेधा से है! शुद्र कुल में जन्मा ...

हेमंत करकरे

Image
'अभिनव भारत के ख़िलाफ़ जाँच में सुस्ती' विनीत खरे बीबीसी संवाददाता, मुंबई 18 अक्तूबर 2010 इस पोस्ट को शेयर करें Facebook   इस पोस्ट को शेयर करें Messenger   इस पोस्ट को शेयर करें Twitter   इस पोस्ट को शेयर करें ईमेल   साझा कीजिए Image caption हेमंत करकरे पहले अधिकारी थे जिन्होंने मालेगावं धमाके में अभिनव भारत का हाथ होने की बात कही थी. मुंबई में 26/11 के हमलों में आतंकवाद विरोधी शाखा(एटीएस) प्रमुख हेमंत करकरे की मौत के बाद क्या अभिनव भारत और हिंदू चरमपंथियों के बारे में जाँच एजेंसियों की कार्रवाई में सुस्ती आई है? मालेगाँव में रहने वाले लोग और कुछ मानवाधिकार कार्यकर्ताओं का कहना है कि हेमंत करकरे के समय में अभिनव भारत को लेकर जिस तरह से तेज़ी से काम हो रहा था, उसमें कमी ज़रूर आई है. मालेगाँव निवासी और पत्रकार अब्दुल हलीम सिद्दीक़ी कहते हैं, "जबसे हेमंत करकरे की मौत हुई है, नए एटीएस प्रमुख राकेश मारिया ने यहाँ का कोई दौरा नहीं किया है, स्थानीय लोगों से कोई बातचीत नहीं की है. आख़िर जो लोग यहाँ पर आए, वो कहीं तो रुके होंगे, उन्हें स्थानीय मदद तो मिली होगी. आज तक उसके बा...