धम्म
धम्म :
वर्तमान समय मैं बुद्धघोष की पुस्तक "विशुद्धिमग्ग" पर आधारित आधुनिक विपस्सना क्रांति, जिसे थाईलैंड के अजाहन सोबिन एस नामटो, वर्मा एवं वर्मिज परम्परा के सियाडो उ तेजानिया तथा पश्चिमी देशों के क्रिस्टोफर टिटमस इत्यादि विपस्सना शिक्षक, विश्व स्तर पर चला रहे हैं। इनके सन्दर्भ में एक स्वाभाविक प्रश्न लोग उठाते हैं कि यह आधुनिक विपस्सना विधि भारतीय गौतमबुद्ध की मौलिक शिक्षा (original teaching) ही है या उससे अलग की विधि है? इसके उत्तर में निर्विवाद, निःसंदेह एवं निःसंकोच होकर कहा जा सकता है कि यह शाक्य मुनि गौतमबुद्ध की मौलिक शिक्षा के अनुरूप नहीं है। संयोगवश बुद्धघोष का जन्म भारत में ही गौतमबुद्ध के परिनिर्वाण के लगभग 1000 वर्ष के बाद हुआ है और "विशुद्धिमग्ग" बुद्ध के मूल सुत्त नहीं अपितु गौतमबुद्ध के सुत्त पर भाष्य या कमेंट्री तथा कई नयी बातों (जिसका गौतमबुद्ध ने अपने सुत्त में कभी उल्लेख ही नहीं किया) का संकलन मात्र है ।अतः भारतीय गौतमबुद्ध की मौलिक विपस्सना विधि या विदस्सना विधि या इनसाइट मेडिटेशन तथा आधुनिक विपस्सना विधि में अन्तर पाया जाना स्वाभाविक है।
शाक्य मुनि गौतमबुद्ध के मौलिक विपस्सना साधना /Insight meditation के निम्नलिखित स्तर या कदम(phases /Steps) हैं जिनको सरलता से"सप्त बोध्झंग(Seven steps to awakening) भी कहते हैं :
(1 सति एवं सत्तिपट्ठान (Systematic Introspection),
(2) धम्म विचय (Investigation of the Cognitive Experience),
(3) वीरिय (Recognition of the strength of cognitive over affective),
(4)पीति (cognitive satisfaction),
(5) पस्सवद्धि(Physical Relaxation),
(6)समाधि (Affective equilibrium),
(7)उपेक्खा (Cognitive Apperception).
स्मरणीय है इन सातों कदम(steps) की विस्तृत चर्चा पिछले बातचीत के सन्दर्भ में विस्तार से की जा चुकी है। वस्तुतः विपस्सना के परिभाषा में प्रायः यह कहा जाता है कि "किसी वस्तु को या किसी विषय को विशेष दृष्टि से देखना चाहिए।" स्पष्ट है विपस्सना के क्रम में अस्तित्ववादी विचारधारा (Existentialist approach) के साधक की विशेष दृष्टि से किसी वस्तु को, देखने की विधि को एक उदाहरण से समझने का प्रयास करें। मान लीजिए किसी चाय पीने वाले कप को आप देखते हैं। देखने के समय स्पष्ट है आप यह सोच रहे हैं कि इस कप का भी अस्तित्व है और मेरा भी अस्तित्व है तभी तो देख पा रहे हैं। इस टेबुल का भी अस्तित्व है और मैं, मेरा या सेल्फ का भी अस्तित्व है तभी तो देख रहे हैं। मैं, मेरा या सेल्फ का अस्तित्व है और शरीर का भी अस्तित्व है तभी तो शरीर की संवेदनाओं को देख पाते हैं। अर्थात देखने के समय, देखने वाला कर्त्ता /सब्जेक्ट (subject) का भी अस्तित्व है और दिखाई पड़ने वाला आब्जेक्ट(object) का भी अस्तित्व है एवं देखने की क्रिया (verb) की भी उपस्थित है। जो लोग किसी भी प्रकार की विपस्सना किये होंगे वे निश्चित रूप से ऐसा अनुभव कर रहे होंगे। परन्तु स्पष्ट है इस प्रकार की सोंच विचार या विपस्सना की विधि शाक्य मुनि गौतमबुद्ध की हरगिज नहीं है ।निर्विवाद रूप से यह तरीका, इस प्रकार की मानसिकता सीर्फ एवं सीर्फ अस्तित्ववादी दार्शनिकों या साधकों की है। विपस्सना के नाम पर इस प्रकार देखने का अभ्यास वे निरन्तर करते रहते हैं और आजीवन मैं मेरा या सेल्फ के भ्रमपूर्ण अस्तित्व (भव) के स्वप्न या सकाय दृष्टि से अपने को उबार या अलग नहीं कर पाते हैं।
स्पष्ट है भारतीय गौतमबुद्ध अस्तित्ववादी(existentialist) विचारधारा के पोषक नहीं अपितु वे तो अनुभववादी (experientialist) विचारक थे। निश्चित रूप से उनकी मौलिक विपस्सना विधि अलग या भिन्न है। जिसे मझ्झिम निकाय के मूलपरिआय सूत्त से भी समझा जा सकता है। स्मरणीय है गौतमबुद्ध की मौलिक विपस्सना विधि में देखने वाला (सब्जेक्ट) एवं देखे जाने वाला वस्तु (आब्जेक्ट) की उपस्थिति या अस्तित्व रहता ही नहीं है। इसे एक उदाहरण से समझने का प्रयास करें :
सप्त बोध्झंग या गौतमबुद्ध के विपस्सना विधि के अन्तिम स्टेप /कदम "उपेक्खा" शब्द के वास्तविक एवं उपयुक्त अर्थ पर विचार करें जिसे आप गलत अनुवाद के कारण , उपेक्षा (equanimity) समझकर उपेक्षित करते रहे हैं। वस्तुतः Upekkha दो मूल शब्दों से बना पालि शब्द है "Upa + ikkhati" (upa /उप=within /अन्दर, ikkhati /इक्खति =seeing /देखना) अर्थात अपने अन्दर देखना। तनिक शान्त मन से विचार करें (वैसे भी यह छठे क्रमांक के समाधि के बाद सातवें क्रमांक का पद है भी) जब आप अन्दर देखना प्रारम्भ करेंगे तो बाहर का सब चीज (आब्जेक्ट) अलग थलग (alienate) हो जाता है या हम उससे विमुख हो जाते है। अर्थात आकलन करने या प्रत्यक्षीकरण करने की बाहरी गतिविधियां (objective activities) बन्द हो जाती है साथ ही बस्तु (आब्जेक्ट) के बाहरी अस्तित्व की अनुपस्थिति। अब नये प्रत्यक्षीकरण (perception) क्रिया नहीं हो रही है अर्थात क्या देख रहे हैं(what to see) इसकी कहानी समाप्त। अब सीर्फ मन के अन्दर देखने की प्रक्रिया (how to see) की कहानी प्रारम्भ( जिसे आन्तरिक (subjective observation) अवलोकन कहते हैं) हो जाती है। दुसरी ओर पहले से ही आप जान चुके हैं कि पूरे शरीर एवं मन में कहीं भी मैं, मेरा या सेल्फ के भ्रमपूर्ण अस्तित्व (भव) है ही नहीं तो स्पष्ट है कोई देखने वाला (subject) भी नहीं। जाहिर है गौतमबुद्ध के मौलिक विपस्सना में सब्जेक्ट एवं अबजेक्ट का अस्तित्व रहता ही नहीं है। प्रारम्भ में सीर्फ क्रिया (verb) का एहसास होता भी है परन्तु कुछ अभ्यास के बाद वह भी नहीं।
उपरोक्त तथ्यों को एक उदाहरण से समझा जा सकता है। एक दारुचीरिये नाम का दक्षिण भारत का साधनारत व्यक्ति बुद्ध से शिक्षा लेने अपने आन्तरिक कारणों से आया। बुद्ध थोड़ी जल्दीबाजी में थे भिक्षाटन के कारण। इसलिए उससे बोले" देखने में सीर्फ देखो" (In the seen there is only the seing.) अब सामान्यतः एक अस्तित्ववादी साधक या व्यक्ति यह अर्थ लगाता है कि किसी चीज को सीर्फ देखना है उस समय या उस वस्तु के सन्दर्भ में कोई प्रतिक्रिया (reaction) नहीं करनी है। उस पर कोई विचार नहीं करनी है। परन्तु यह व्याख्या बुद्ध की मौलिक शिक्षा के विपरीत है।
गौतमबुद्ध की मौलिक शिक्षा या विपस्सना विधि में देखना या बाहर देखने की कोई क्रिया नहीं है। अपितु देखने या प्रत्यक्षीकरण की कोई क्रिया नहीं अपितु अन्दर सीर्फ अन्दर उपेक्खा की क्रिया के अनुरूप सीर्फ देखने या प्रत्यक्षीकरण की प्रक्रिया का ही आकलन होता है। ऐसा दारुचीरिये के समझ में बातें
आ गयी और वह तत्क्षण अर्हत हो गया। ऐसा उल्लेख बुद्ध साहित्य में है ।आज की चर्चा को यहीं विराम देते हैं ।अगले दिन कुछ अन्य महत्वपूर्ण विषय पर चर्चा का प्रयास करेंगे। शाक्य मुनि गौतमबुद्ध के मौलिक शिक्षाओं को पसन्द एवं अभिरुचि रखने वाले सभी भारतीय एवं विदेशी व्यक्तियों को धन्यवाद एवं साधुवाद ।मंगल हो ।कल्याण हो ।
शाक्य मुनि गौतमबुद्ध के मौलिक विपस्सना साधना /Insight meditation के निम्नलिखित स्तर या कदम(phases /Steps) हैं जिनको सरलता से"सप्त बोध्झंग(Seven steps to awakening) भी कहते हैं :
(1 सति एवं सत्तिपट्ठान (Systematic Introspection),
(2) धम्म विचय (Investigation of the Cognitive Experience),
(3) वीरिय (Recognition of the strength of cognitive over affective),
(4)पीति (cognitive satisfaction),
(5) पस्सवद्धि(Physical Relaxation),
(6)समाधि (Affective equilibrium),
(7)उपेक्खा (Cognitive Apperception).
स्मरणीय है इन सातों कदम(steps) की विस्तृत चर्चा पिछले बातचीत के सन्दर्भ में विस्तार से की जा चुकी है। वस्तुतः विपस्सना के परिभाषा में प्रायः यह कहा जाता है कि "किसी वस्तु को या किसी विषय को विशेष दृष्टि से देखना चाहिए।" स्पष्ट है विपस्सना के क्रम में अस्तित्ववादी विचारधारा (Existentialist approach) के साधक की विशेष दृष्टि से किसी वस्तु को, देखने की विधि को एक उदाहरण से समझने का प्रयास करें। मान लीजिए किसी चाय पीने वाले कप को आप देखते हैं। देखने के समय स्पष्ट है आप यह सोच रहे हैं कि इस कप का भी अस्तित्व है और मेरा भी अस्तित्व है तभी तो देख पा रहे हैं। इस टेबुल का भी अस्तित्व है और मैं, मेरा या सेल्फ का भी अस्तित्व है तभी तो देख रहे हैं। मैं, मेरा या सेल्फ का अस्तित्व है और शरीर का भी अस्तित्व है तभी तो शरीर की संवेदनाओं को देख पाते हैं। अर्थात देखने के समय, देखने वाला कर्त्ता /सब्जेक्ट (subject) का भी अस्तित्व है और दिखाई पड़ने वाला आब्जेक्ट(object) का भी अस्तित्व है एवं देखने की क्रिया (verb) की भी उपस्थित है। जो लोग किसी भी प्रकार की विपस्सना किये होंगे वे निश्चित रूप से ऐसा अनुभव कर रहे होंगे। परन्तु स्पष्ट है इस प्रकार की सोंच विचार या विपस्सना की विधि शाक्य मुनि गौतमबुद्ध की हरगिज नहीं है ।निर्विवाद रूप से यह तरीका, इस प्रकार की मानसिकता सीर्फ एवं सीर्फ अस्तित्ववादी दार्शनिकों या साधकों की है। विपस्सना के नाम पर इस प्रकार देखने का अभ्यास वे निरन्तर करते रहते हैं और आजीवन मैं मेरा या सेल्फ के भ्रमपूर्ण अस्तित्व (भव) के स्वप्न या सकाय दृष्टि से अपने को उबार या अलग नहीं कर पाते हैं।
स्पष्ट है भारतीय गौतमबुद्ध अस्तित्ववादी(existentialist) विचारधारा के पोषक नहीं अपितु वे तो अनुभववादी (experientialist) विचारक थे। निश्चित रूप से उनकी मौलिक विपस्सना विधि अलग या भिन्न है। जिसे मझ्झिम निकाय के मूलपरिआय सूत्त से भी समझा जा सकता है। स्मरणीय है गौतमबुद्ध की मौलिक विपस्सना विधि में देखने वाला (सब्जेक्ट) एवं देखे जाने वाला वस्तु (आब्जेक्ट) की उपस्थिति या अस्तित्व रहता ही नहीं है। इसे एक उदाहरण से समझने का प्रयास करें :
सप्त बोध्झंग या गौतमबुद्ध के विपस्सना विधि के अन्तिम स्टेप /कदम "उपेक्खा" शब्द के वास्तविक एवं उपयुक्त अर्थ पर विचार करें जिसे आप गलत अनुवाद के कारण , उपेक्षा (equanimity) समझकर उपेक्षित करते रहे हैं। वस्तुतः Upekkha दो मूल शब्दों से बना पालि शब्द है "Upa + ikkhati" (upa /उप=within /अन्दर, ikkhati /इक्खति =seeing /देखना) अर्थात अपने अन्दर देखना। तनिक शान्त मन से विचार करें (वैसे भी यह छठे क्रमांक के समाधि के बाद सातवें क्रमांक का पद है भी) जब आप अन्दर देखना प्रारम्भ करेंगे तो बाहर का सब चीज (आब्जेक्ट) अलग थलग (alienate) हो जाता है या हम उससे विमुख हो जाते है। अर्थात आकलन करने या प्रत्यक्षीकरण करने की बाहरी गतिविधियां (objective activities) बन्द हो जाती है साथ ही बस्तु (आब्जेक्ट) के बाहरी अस्तित्व की अनुपस्थिति। अब नये प्रत्यक्षीकरण (perception) क्रिया नहीं हो रही है अर्थात क्या देख रहे हैं(what to see) इसकी कहानी समाप्त। अब सीर्फ मन के अन्दर देखने की प्रक्रिया (how to see) की कहानी प्रारम्भ( जिसे आन्तरिक (subjective observation) अवलोकन कहते हैं) हो जाती है। दुसरी ओर पहले से ही आप जान चुके हैं कि पूरे शरीर एवं मन में कहीं भी मैं, मेरा या सेल्फ के भ्रमपूर्ण अस्तित्व (भव) है ही नहीं तो स्पष्ट है कोई देखने वाला (subject) भी नहीं। जाहिर है गौतमबुद्ध के मौलिक विपस्सना में सब्जेक्ट एवं अबजेक्ट का अस्तित्व रहता ही नहीं है। प्रारम्भ में सीर्फ क्रिया (verb) का एहसास होता भी है परन्तु कुछ अभ्यास के बाद वह भी नहीं।
उपरोक्त तथ्यों को एक उदाहरण से समझा जा सकता है। एक दारुचीरिये नाम का दक्षिण भारत का साधनारत व्यक्ति बुद्ध से शिक्षा लेने अपने आन्तरिक कारणों से आया। बुद्ध थोड़ी जल्दीबाजी में थे भिक्षाटन के कारण। इसलिए उससे बोले" देखने में सीर्फ देखो" (In the seen there is only the seing.) अब सामान्यतः एक अस्तित्ववादी साधक या व्यक्ति यह अर्थ लगाता है कि किसी चीज को सीर्फ देखना है उस समय या उस वस्तु के सन्दर्भ में कोई प्रतिक्रिया (reaction) नहीं करनी है। उस पर कोई विचार नहीं करनी है। परन्तु यह व्याख्या बुद्ध की मौलिक शिक्षा के विपरीत है।
गौतमबुद्ध की मौलिक शिक्षा या विपस्सना विधि में देखना या बाहर देखने की कोई क्रिया नहीं है। अपितु देखने या प्रत्यक्षीकरण की कोई क्रिया नहीं अपितु अन्दर सीर्फ अन्दर उपेक्खा की क्रिया के अनुरूप सीर्फ देखने या प्रत्यक्षीकरण की प्रक्रिया का ही आकलन होता है। ऐसा दारुचीरिये के समझ में बातें
आ गयी और वह तत्क्षण अर्हत हो गया। ऐसा उल्लेख बुद्ध साहित्य में है ।आज की चर्चा को यहीं विराम देते हैं ।अगले दिन कुछ अन्य महत्वपूर्ण विषय पर चर्चा का प्रयास करेंगे। शाक्य मुनि गौतमबुद्ध के मौलिक शिक्षाओं को पसन्द एवं अभिरुचि रखने वाले सभी भारतीय एवं विदेशी व्यक्तियों को धन्यवाद एवं साधुवाद ।मंगल हो ।कल्याण हो ।
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