ध्यान विधि विपश्यना

ध्यान विधि विपश्यना 

जब बुद्ध को किताबो में धर्म नही मिला तो उनकी जूठन को जिसने उगला फिर दूसरे ने खाया फिर पलटी की उस पलटी को तीसरे ने खाया, फिर पलटी की , फिर उस पलटी को चौथे ने खाया .... इस तरह २५०० साल गुजर गए अब जिसने इस पुस्तक को लिखा और जो उसको चाट रहें है बड़ी विडंबना है कि उनको धर्म मिल गया है! बुद्ध को शिक्षा देने के लिए कपिलवस्तु सहित विश्व के प्रकांड विद्धवान उपस्थित थे तब भी पढ़ने और सुनने से बुद्ध(गौतम) को धर्म नही मिला ! यह पढ़ने और सुनने से मिलाता ही नही है! पढ़ने और सुनने से श्रुतमयी प्रज्ञा जगती है! ध्यान में बैठते ही चिंतनमय प्रज्ञा जगती है! गहन ध्यान में चिन्तनमयी प्रज्ञा समाप्त हो जाती है और इससे प्रत्यक्ष अनुभूति होती है, ब्रहमांड में घटित समस्त घटनाओ की! इस घटना को स्थिति-प्रज्ञ कहते है, जो केवल छठी इन्द्रीय से देखी जाती है या यूं कहलो समस्त पञ्च इन्द्रियां अपने दिव्य सरूप में होती हैं! इसलिए मित्र बार-बार कहता हूँ अध्यात्म के विषय की समस्त पुस्तको में आग लगा दो क्योकि किताबो से बोधि(अनुभूति) नही जगती केवल बुद्धि(साहितिक ज्ञान) जगता है! रसगुल्ले की किताबे पढ़कर किसी ने रसगुल्ले का स्वाद नही पाया ! रसगुल्ला खा कर ही रसगुल्ले का आनन्द पाया जा सकता है! ऐसे ही किताबे पढ़कर बुद्ध द्वारा अर्जित अनुभूति को नही पाया जा सकता है केवल विपश्यना विद्या (बुद्ध द्वारा खोजी गयी ध्यान विधि) से ही बुद्ध के ज्ञान की अनुभूति की जा सकती है अन्यथा नही !

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