धम्म-सुझाव
अति सुन्दर! ज्ञानी को कहने की जरूरत क्या है और अज्ञानी समझेगा क्या? ध्यान के समय शरीर में जो उथल-पुथल होती है उसको देखकर मूर्खो ने प्राणायाम बना दिया! इतनी गंभीर चर्चा करेंगे तो मूर्खजन उसको बुद्ध का नीतिशास्त्र बना देंगे और खुद को विद्वान कहने लगेगें! इसलिए भगवान बुद्ध अध्यानी व्यक्तियों से कोई धम्म चर्चा ही नही करते थे केवल सील की बात करते थे! जिसका सील पुष्ट नही है वह वाणी विलास में उलझ कर अपनी बहुत बड़ी हानि कर लेगा! मित्र मूढ़जन पर करुणा करो! जिन्हें पञ्च विकार की अनुभूति नही है उनसे सप्तबोझंग की चर्चा करना या चार ध्यानो की चर्चा करना अनुचित है! गुरु गोयन्का जी ने ऐसी वाणी विलास की पुस्तकों पर अपने जीवन काल में ही रोक लगा दी थी! जो गलती महाकश्यप ने की आप उसकी पुनरावृत्ति न करें! तिपिटक के संकलन से तिपिटक-पाठी पैदा हो गये और खुद को बुद्ध-वादी और बुद्ध ज्ञानी कहने लगे ! भिक्षुओ में अरहंत होना बंद हो गए इसलिए बुद्ध की ध्यान पद्दति भारत से नष्ट हो गयी! अगर साकेत में एक भी अरहंत होता तो भिक्षुओ के यूँ सिर काट कर कोई सरयू में न बहा पाता! मित्र करुणा करो, ध्यान करते हो तो धम्म तरंगे विखेरें, वाणी विलास से बचें ! जगत का मंगल हो कल्याण हो !
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