shubh kamna
तो करते रहिए मन के प्रवाह को रोकना नही चाहिए जो व्यक्ति अपने मन के प्रवाह को रोक लेता है उसमें अहंकार जागने लगता है जिस कारण उस व्यक्ति की सरलता चली जाती है और शरीर का आकर्षण भी चला जाता है! शरीर का वात्सल्य समाप्त होते ही शरीर रोगों का घर हो जाता है इसलिए जिस चीज की जैसी अनुभूति हो बच्चों की तरह कह देना चाहिए तभी तो कहा जाता है "बच्चे बूढ़े एक समान"! अत्यंत सरलता की यही पहचान है! बूढों की सरलता किशोरों-युवाओ और प्रौढ़ के लिए मार्ग दर्शन का काम भी करती है अगर उसमें प्रपंच नही होता है तो ! प्रभु से प्रार्थना है आप दीर्घ आयु हो और बच्चो के सामान ही सबके ह्रदय स्पर्शी भी हों ! सबका मंगल हो कल्याण हो !
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