लेखक की मजबूरी



Arya Prajapati Parsa Ram आप मुझसे काफी समय से जुड़े हैं, मेरी पोस्ट को भी आप ध्यान से पढ़ते हैं और संतुलित प्रतिक्रिया भी देते हैं यह अच्छी बात है, लेखन का कार्य बहुत ही चतुराई पूर्ण कार्य है! मनुवादी ब्राह्मण बहुत सजग रहते हैं वे अपने विरुद्ध कोई तार्किक किताब बाजार में आने ही नही देते हैं और किसी मनुवादी प्रकाशन से कोई ऐसी पुस्तक बाजार में नही भेजी जाती है जिसके वितरण पर सरकार या न्याय-पालिका कोई प्रतिवंध लगाये! मैं तो आपकी समझ को परखना चाह रहा था ! मेरा डॉ. सुरेन्द्र से क्या लेना-देना? उनकी पुस्तक पढ़कर आपकी जो समझ बनी है, मुझे तो उसका भंजन करना हैं, आप उनके सबसे उत्तम श्लोक से आरम्भ करो मैं वहीं से भंजन आरम्भ करूँगा! मेरी लगभग ४०० किलो पुस्तकें बाबा रामदेव के यहाँ सेवाव्रती प्रकल्प में छुट गयीं/ या यूं कह लो छिन गयीं है जिनमे मनुस्मृति भी थी शायद गीता प्रकाशन की ! गीता प्रकाश से अच्छा तो कोई प्रकाशन हिंदूओ में नहीं है! अब अब आप बताओ अप किस प्रकाशन की पुस्तक पढ़ रहे हैं! सारा खेल तो प्रकाशन में होता है, क्या बताया जाये और क्या छिपाया जाये क्योकि पुस्तक की मार्केटिंग तो प्रकाशन को करनी है इसलिए लेखक जानते हुए भी वह नही लिख पाता है जिससे वितरण प्रभावित होता है! आप कुछ समझे मैं किस ओर इशारा कर रहा हूँ ?

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