भिक्षु और भिखारी में अंतर
भिक्षा के कुछ नियम हैं, जिस व्यक्ति के पास जो कुछ भी हो वह उसका दान कर देता है, उसके पश्चात् आध्यात्मिक ज्ञान पर चलते हुए भिक्षा से अपने शारीर का पोषण करता है तथा संग्रह नही करता! इस कार्य में इतनी सुचिता रखता है कि अगले समय का भोजन भी संग्रह नही करता! पूर्णतया प्राकृतिक चर्या धारण करता है किन्तु किसी की आधीनता स्वीकार नही करता! भगवान बुद्ध ने वर्षावास को छोड़ कर तीन दिन से अधिक एक स्थान पर रुकने को वर्जित किया है! भिक्कू को चलते ही रहना है रुकना नहीं है न किसी के घर में न विहार में ! आजकल तो सेठो के माकन में रुकते है या विहार में और इच्छा अनुसार पकवान बनवाकर खाते है! ऐसे लोग न तो भिक्षु की चर्या धारण करते हैं न ही उनको कोई आध्यत्मिक लाभ होता है ! भिक्षु होने के लिए पहले सर्वस्व का त्याग जरुरी है, भिखारी होने के लिए नहीं ! जो बिना दान किये मांगता है वह भिखारी है जो सर्वस्व दान करके शरीर का पोषण करने के लिए मांगते हुए ध्यान-साधना का कार्य करता है भिक्षु है!
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Mukesh Vissarwal Kamlesh Kumar Mittra जटिल नहीं है, जटिल बना दिया गया है, मूर्तियां प्रतीकात्मक होती हैं, वो चाहें किसीकी भी हो, और जिसकी वो मूर्ति होती है उसके गुण/दोष उसमें नहीं आ जाते । शक्तियां तो दूर रहा ।
यही बात बुद्ध की प्रतिमाओं पर भी लागू होती हैं Kamlesh Kumar Mittra Mukesh Vissarwal भिक्षा के कुछ नियम हैं, जिस व्यक्ति के पास जो कुछ भी हो वह उसका दान कर देता है, उसके पश्चात् आध्यात्मिक ज्ञान पर चलते हुए भिक्षा से अपने शारीर का पोषण करता है तथा संग्रह नही करता! इस कार्य में इतनी सुचिता रखता है कि अगले समय का भोजन भी संग्रह नही करता! पूर्णतया प्राकृतिक चर्या धारण करता है किन्तु किसी की आधीनता स्वीकार नही करता! भगवान बुद्ध ने वर्षावास को छोड़ कर तीन दिन से अधिक एक स्थान पर रुकने को वर्जित किया है! भिक्कू को चलते ही रहना है रुकना नहीं है न किसी के घर में न विहार में ! आजकल तो सेठो के माकन में रुकते है या विहार में और इच्छा अनुसार पकवान बनवाकर खाते है! ऐसे लोग न तो भिक्षु की चर्या धारण करते हैं न ही उनको कोई आध्यत्मिक लाभ होता है ! भिक्षु होने के लिए पहले सर्वस्व का त्याग जरुरी है, भिखारी होने के लिए नहीं ! जो बिना दान किये मांगता है वह भिखारी है जो सर्वस्व दान करके शरीर का पोषण करने के लिए मांगते हुए ध्यान-साधना का कार्य करता है भिक्षु है! Mukesh Vissarwal Kamlesh Kumar Mittra आज जिसके पास संसाधन हैं वो ही सरवाइव कर सकता है ।
भिक्षा मांगने से ना तो सारी जरूरी वस्तुओं को एकत्रित किया जा सकता है और ना ही आर्थिक या शारिरिक योगदान देश या समाज को दिया जा सकता है ।
हाँ कुछ लोग मन की शान्ति के लिए विपासना का आडम्बर कर लेंगे,,, लेकिन कुछ दिनों बाद फिर वैसे हो जाएंगे । तो आज के सन्दर्भ में भिक्षा किस प्रकार प्रासंगिक है..? जबकि ये विधि या जीवन यापन की क्रिया हमें या किसी भी मानव को कोई सुविधा या सुरक्षा प्रदान नहीं करती । एक अकेला व्यक्ति भूखा रह सकता है, पूरा परिवार नहीं । तो इसकी जरूरत क्या है मौजूदा वक्त में.?? Kamlesh Kumar Mittra Mukesh Vissarwal भिक्षा वृति नही है ! वृति और संपत्ति का त्याग कर के ही कोई भिक्षु बनता है ! जिसने कुछ त्यागा ही नही वह तो भौतिक सुखो की इच्छा के कारण अधात्मिक सुख से भी बंचित हो जायेगा ! ऐसे मूढ़ को न धन सुख मिलेगा न ध्यान सुख ! Kamlesh Kumar Mittra Mukesh Vissarwal यह विज्ञान गुप्त ज्ञान है मोहब्बत की तरह जो करता है सुख पाता है ! मोहब्बत करना आसान है ५०% लोग कर लेते हैं! ध्यान १% भी नही कर पाते इसलिए ध्यान सुख की बाते चलन में नही हैं, जिनकी कोई बात ही नहीं करता लोगो को पता भी नही चलता की ध्यान सुख भी कोई चीज है !
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