भगवा में रंग जाओगे



मित्र सत्यानाश कर दिया आपने, शब्दकोष के अर्थ मत जोड़ो, ध्यान करो ! हिदी भाषा में इसे छायावाद कहते हैं यह उपमा अलंकर है और तीसरे लोक की बाते हैं ! कबीर के दर्शन का अर्थ भौतिक जगत में मत खोजो ! इसी के बारे में तुलसी ने कहा है " जिसकी रही भावना जैसी प्रभु मूर्त देखी तित तैसी! कबीर की उलटवांसी को समझने के लिए शब्दकोष निरर्थक पुस्तक है उसे गंगा में फेंक दो और वहीँ बैठकर ध्यान लगा लो तो शायद उल्टवांसी समझ आएगी ! मैं कोई व्याख्या इस लिए नहीं दे रहा हूँ क्योंकि आप उसका शब्दकोष से मिलान करने लगोगे और अधिक उलझ जाओगे ! यह भक्त और भगवान के बीच प्रेम की भाषा है जो सभी ग्रंथो से परे है ! सांकेतिक रूप में कहूँ तो यह दो प्रेमियों की भाषा है जो आँखों से कही जाती है और दिल से समझी जाती है ! यज्ञ छोड़कर ध्यान करो धर्म वहीँ पर पाओगे, देकर खुद की आहुति भगवा में रंग जाओगे !

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