किताबी या गैर किताबी ज्ञान
किताबी या गैर किताबी ज्ञान
अगर आप का इशारा कुरान की ओर है, तो मुझे दुःख है आपको अभी कुरान की ABCD नही पता है अन्यथा आप यह प्रश्न ही न उठाते! कभी १०० लाइने लिखकर देखो फिर १०० लोगो को पढ़ा कर देखो ! जिस भावना से आपने १०० लाइने लिखी होंगी पढ़ने बाले उसका सत्यानाश कर देंगे ! दूसरा प्रयोग करो किसी वस्तु विशेष के सामने १०० लोगो को खड़ा कर दो कुछ समय के लिए फिर उनसे कहो इस पर १००-१०० लाइने लिखो ! जब वे लिखेंगे तो उन में 90% समानता होगी ! मैं इतना ही कहना चाहता हूँ, वेद हों, सत्यार्थ प्रकाश हो या तिपिटक हो या कुरान हो ! दूसरे समाज के साथ का मतभेद समझ आता है किन्तु एक किताब वाले समाज का आपस में झगड़ा बना रहता है तो यह किताबे सिखा क्या रहीं है? किताब दोष पूर्ण है या पढ़ने बाला दोष पूर्ण है या पढ़ने बाला दोष पूर्ण है, कुछ तो गड़बड़ है! इसी लिए मैं कहता हूँ एक उम्र के बाद किताबो का परित्याग कर देना चाहिए जैसे बच्चा माँ का दूध पीना छोड़ देता है! जब दूध के साथ अन्य चीजे लेता और समझता है तब उसकी बुद्धि का विकास होता है शरीर का विकास होता है ! जो बच्चे माँ के पास ही पड़े रहते हैं, न तो उनके शरीर का विकास होता है, न ही बुद्धि विकास होता है! कुरान या जो भी आपकी पुस्तक हो पढ़ लो एक साल तक एक-एक शब्द कंठस्त हो जाये, समझ लो ! एक साल के लिए अपनी पहचान छोड़ कर दूसरो के मठ मंदिर गुरुद्वारा, निर्जन पहाड़ आदि किसी पर निकल जाओ (मोहम्मद साहब भी ऐसा ही करते थे) में उनकी पद्दति से रहो फिर एक साल बाद लौट आओ ! फिर जो ज्ञान विकसित होगा वह किताबी ज्ञान नही होगा ! इस काम में दो साल लगेगा किन्तु यह ज्ञान व्यक्ति का अपना ज्ञान होगा किताबों की जूठन नही होगी! अब आप अपना ज्ञान खुद परखें किताबी है या गैर किताबी है !
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