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Showing posts from 2020

वेदना और दुःख का सम्बन्ध

चित्त को संस्कारित किया जाता है जिस कारण दुखो का अम्बार लग जाता है किन्तु विपशना में चित्त को संस्कार मुक्त किया जाता है! इस कारण साधक लौकिक आसक्तियो से मुक्त होने लगता है और उसको दुःख की अनुभूति नहीं होती है! वास्तव में संसार में दुःख जैसी कोई चीज नहीं है! लौकिक वस्तुओ की आसक्ति दुःख की अनुभूति कराती है! Vinod Kumar मित्र वेदना शरीर में उत्पन्न होती है किन्तु मन इसे चित्त द्वारा महसूस करता है! जब मन चित्त के साथ नही होता तो शरीर में उत्पन्न वेदना की मन को अनुभूति नहीं होती है! मन की चित्त के साथ आसक्ति दुःख का कारण है! Vinod Kumar मैं बुद्ध से अधिक ज्ञानी अभी तो नही हूँ! प्रतीत्य-समुत्पाद पर चर्चा, बुद्ध अधपके साधको से करते थे ताकि वे शीघ्रता से पक जाएँ! बुद्ध नवीन साधको और सामन्य-गृह्स्तो से प्रतीत्य-समुत्पाद की चर्चा नही करते थे! फिर कहूँगा काने से रंगों की चर्चा करना सार्थक हो सकता है परन्तु अंधे से रंगों की चर्चा करना ही मूढ़ता है!

उर्जा को सही प्रयोग

उर्जा को सही प्रयोग DrRamesh Singh आपकी बात सत्य भी हो सकती है परन्तु 2500 साल पहले कुछ तो था! हो सकता है कचरा ही हो आध्यात्मिकता के जगत में! रहगयी बात वास्तु-कला और लेखन की तो गुप्तकाल में अपने स्वर्णिम रूप में था उसके बाद मुगल काल में, दक्षिण भारत और मध्य भारत में भी उक्त पर जोर दिया गया! बुद्ध के अशोक कालीन जो स्तंभ मिले हैं उनमें लवणता का अभाव है सीधा-सीधा लिख दिया गया है! जो बाद में भी लिखा जाता रहा! हर्ष वर्धन के काल तक तो उत्तर और दक्षिण भारत में बौद्ध दर्शन का ही बोल-बाला रहा है! वैदिक ग्रन्थ (जो अध्ययन से ही कचरे जैसे प्रतीत होते हैं) राज्य की प्राथमिकता में नही थे! राजपूत काल में शैशव और वैष्णो पंथ द्वारा एक दुसरे को नीचा दिखने के चक्कर में कचरे की छटनी हुई, जिससे उपनिषद, ब्राह्मण ग्रन्थ और पुराणों निकले और इनको विस्तार दिया गया! राज्य का साथ मिलने के कारण पुरोहितो और पंडों की बड़ी फ़ौज तैयार हो गयी! साधना एक ऐसी कला है जिसके अभ्यास से विज्ञान निकलता है जो आभ्यास नहीं मात्र अध्ययन करता है तो केवल मूढ़ता निकलती है! जिन भिक्षुओ ने शैशव और वैष्णो पंथ अपना लिया वे ही ब्रह्मचारी, न...

बोधिसत्व और सम्यक सम्बुद्ध में अंतर ....

बोधिसत्व और सम्यक सम्बुद्ध में अंतर .... दो शब्द प्रयोग होते हैं! प्रथम बोधिसत्व दूसरा सम्यक सम्बुद्ध और बुद्ध ! बुद्ध वंशावली के अनुसार कई कल्पो में कोई सम्यक सम्बुद्ध होता है उस सम्यक सम्बुद्ध के साथ कई बुद्ध हो सकते हैं! बुद्ध स्वतंत्र रूप से भी उत्त्पन्न होते हैं! नास्तिकवादीयों के लिए मेरी बात स्वीकार करना कठिन होगा किन्तु आपने प्रश्न उठाया है तो मैं इसका उत्तर देने को बाध्य हूँ! बुद्ध वंशावली के अनुसार वह व्यक्ति अपने अनंत जन्मो तक सील का पालन करते हुए अपनी आत्मा को विकार विमुक्त करने का प्रयास करता हैं, अपने जिस अंतिम जन्म में वह आत्मा को विकार विमुक्त कर लेता है, उसका वह जन्म सम्यक सम्बुद्ध, बुद्ध या अरहंत का होता है! ऐसे व्यक्ति जो अपने अनंत जन्मो तक जनकल्याण के कार्य करता है तथा सामान्य जन से अधिक प्रतिभावान दिखता है ऐसे व्यक्ति को बुद्ध दर्शन में बोधिसत्व कहा जाता है! इसी आधार पर बाबा साहब को भी बोधिसत्व कहा जाता है! कुछ महाथेरो का मानना है कि बाबा साहब ही आने वाले सम्यक सम्बुद्ध है और अपनी पारमिताओ को पूरा कर रहे हैं! जिस प्रकार जन्म लिए व्यक्ति की सामान्य आयु 120 मानी जाती...

सवाल-जबाब -2

Kamlesh Kumar Mittra मित्र, विज्ञान विकास के चरण में है! जो आज की मशीनों की पकड़ में नही है कल आजायेगा, तब मान लेना ! · Reply · Share · 10h Vinod Kumar badge icon Author Kamlesh Kumar Mittra जिन गुण-विशेषताओं से युक्त बताया जाता है, उन्हें देखते हुए और उनकी समीक्षा करने पर यह तत्व केवल कल्पना सिद्ध होता है ! · Reply · Share · 7h Kamlesh Kumar Mittra Vinod Kumar मित्र, पहले लकड़ी के औजार बने, फिर लोहे के, फिर लोहे की मशीने बनी, फिर डीजल इंजन की मशीने बनी, फिर इलेक्ट्रिक मशीने बनी, उसके बाद लेक्ट्रोनिक मशीने बनी, इस समय मैग्नेटिक और सोलर उर्जा पर आधारित मशीने बन रही हैं, कुछ वैज्ञानिक हायड्रोजन उर्जा की मशीने बनाने के लिए पानी का प्रयोग कर रहे हैं! हर विकास के क्रम में आगे के अविष्कार अकल्पनीय रहे हैं परन्तु वे सब हुए हैं! मैं एक इंजीनिरिंग कालेज में इलेक्ट्रॉनिक्स का टीचर भी रहा हूँ इसलिए कहता हूँ जो आज नही दिखता है इससे यह सिद्ध नही होता कि वह है नही! आकाश गंगा के लाखो तारे दिखाई नहीं देते किन्तु कल दुर्वीन की पकड़ में आजायेंगे! ...... · Reply · Share · 7h Vinod Kumar badge icon Autho...

आत्मा है .......

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आत्मा है ....... Vinod Kumar आपका प्रश्न एडवांस है! इस पर चर्चा करना उचित न होगा! साधना की प्रमुख रूप से दो पद्दतियां हैं एक बहिर्मुखी, दूसरी अंतर्मुखी ! कबीर, रविदास, बुद्ध आदि अरहंत साधना की अंतर्मुखी पद्दति से जुड़े रहे हैं! साधना की उपलब्धि के रूप में छ: प्रकार की अभिज्ञायें प्राप्त होती हैं जिनको सभी छ: अभिज्ञान प्राप्त हो जाते हैं वे सम्यक सम्बुद्ध होते हैं, अन्य अरहंत की कोटि में आते हैं! ऐसा उल्लेख महा-सतिपटठान में मिलता है! मैं भी साधना की अंतर्मुखी पद्दति से जुड़ा हूँ और दिन-प्रतिदिन सूक्ष्मता की तरफ बढ़ता जाता हूँ जैसा आचार्यो ने कहा था, इस आधार पर मेरी चिंतनमय प्रज्ञा उस उर्जा की अनुभूति कर पाती है जो शरीर से अलग है यह आत्मा भी हो सकती है किन्तु ध्यान रहे भगवान बुद्ध ने कहा है कि आत्मा भी अजर-अमर नहीं है यदि इसको भी विकार विमुक्त कर दिया जाये तब अनंत्ता की स्थिति उत्पन्न हो जाती है! शरीर तो अग्नि के संपर्क में आने से नष्ट हो जाता है किन्तु आत्मा विकार विमुक्ति होने पर ही समाप्त होती है! हिन्दू और बौद्ध दर्शन की बीच यही मूल भेद है ?(हिन्दू-वैदिक) या उपनिषद वादी कहते हैं आत्म...

सवालों के जबाब

Ramprasad Sikandar मित्र भगवान बुद्ध ने कहा है कि भीख मांगने से कोई भिक्षु नही बन जाता, (अर्थात हर भीख मांगने बाला भिखारी नहीं होता) ......... ढाई आखर पढ़े बिना कोई ग्यानी नही बनता .......... Ramprasad Sikandar मित्र आपका कमेन्ट पढ़ कर मैं चक्कर में पड़ गया अंध भक्त कौन है? आस्तिकता में जिसकी आस्था है वह अंध भक्त है तो जिसकी नास्तिकता में आस्था है वह भी अंधभक्त ही है! ज्ञानी तो वह है जो कबीर के कहे अनुसार "....सार-सार को गहि रहे थोथा दे उड़ाए..." ! मित्र आपकी भाषा पर पकड़ बहुत कमजोर है! आप बात अधर्म की करते हो और शब्द "धर्म" प्रयोग करते हो! धारण करे सो धर्म है वर्ना कोरी बात! पेट का लीवर कहे मुझे आजादी चाहिए क्या दी जा सकती है? लीवर को शरीर से बाहर निकाला जा सकता है! लीवर का धर्म है शरीर के लिए बंधन में रहे परन्तु लीवर के निर्माण में प्रयुक्त सामग्री को आजादी है कि वह खून के साथ मिलकर किसी अन्य अंग की संरचना में शामिल हो जाये या शारीर से बहार निकल जाये! धर्म बंधन है, आजादी भी धर्म है, पहले समझो तो धर्म क्या है और धारण क्या करना है और छोड़ना क्या है! Santosh Agrawal ...

कर्म-कांड मात्र सामाजिक-नाटक

कर्म-कांड मात्र सामाजिक-नाटक Badan Singh Bauddh भाई मेरे, शादी सम्बन्धी कोई भी कर्म-कांड मात्र एक नाटक है! नाटक मनोरंजन के लिए होता है इस बात से कोई फर्क नही पड़ता कि फेरे पांच लिए जा रहे हैं या सात या केवल वचन दिया जा रहा है! संतति की उत्त्पति के लिए यह उद्घोषणा है इस नाटक को कितना ही लम्बा कर दो या छोटा कोई फर्क नही पड़ता है! उदाहरण - सुन्नी की शादी मौलवी कराता है जबकि शिया की शादी में मौलवी की जरुरत नही होती, दोनों ही शादियों में एक बात समरूप है वह यह है जब-तक दोनों (स्त्री-पुरुष) शारीरिक सम्बन्ध नही बना लेते हैं, न निकाह-परवान चढ़ता है और न ही दोनों को पति-पत्नी माना जाता है! मैं कई बार कहता हूँ मनुवाद के उलटे खड़ा हो जाना आंबेडकरवाद नही है, ऐसे विषयों को बहुत अधिक अहमियत देने की आवश्यकता नही है! जिन विषयों पर चर्चा हो वह इस प्रकार के हों, कि दलित-जाति में कहाँ प्रतिभाएं उत्पन्न हुई हैं? क्या उनकी प्रगति में कोई बाधा तो नही आ रही है! सात साल का बच्चा अपनी प्रतिभाओ का प्रदर्शन करने लगता है उसको उपयुक्त वातावरण मिलेगा तो प्रतिभा विकसित होकर दलित समाज का उत्तथान करेगी अन्यथा समाप्त हो ...

मूढ़ की संगत न करें:-

मूढ़ की संगत न करें:- मूर्खता पूर्ण विषयों पर तर्क-वितर्क करना उच्च कोटि की मूर्खता है किन्तु है मूर्खता ही! ऐसे विषयों को सुने और मुस्कराते हुए निकल जाएँ ! जब कुत्ता बोलने लगे और हाथी उड़ने लगे तो ऐसे-विषयों को कथा-कहानी कहा जाता है जिसके सार पर चर्चा की जाती है नाकि तथ्य पर, जो व्यक्ति कथा-कहानियों के तथ्य पर चर्चा करने पर जोर देता है मूर्ख है! कथा कहानियो के पत्रों और तथ्यों की भौतिक सत्यता पर चर्चा नहीं की जाती है बल्कि उससे निकले सन्देश को ग्रहण किया जाता है अथवा त्याग दिया जाता है! जो मुर्ख कथा-कहानियों को इतिहास समझता है और उनमे भातिक गुणों को खोजता है मूढ़ है! भगवान बुद्ध ने भिखुओ से कहा है कि मूढ़ की संगत न करें ! Himanshumeagie Sharma महाकश्यप ने प्रथम संगीति करके बुद्ध बचनो को तिपिटक में संग्रहीत किया जानते हो क्यों? ताकि आरएसएस वाले भगवान बुद्ध के मुख से अपनी घ्रणित मंशा का दुष-प्रचार न करने लगें! इसका दुष-परिणाम यह हुआ कि हिंदूओ ने बुद्ध विश्व-विद्यालय नष्ट किये और करवाए! जोगेंद्रनाथ मंडल की आत्मकथा कहने वाला, क्या आरएसएस का प्रवक्ता नही है? अपने दिल पर हाथ रख कर अपने से...

कास्ट सिस्टम

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किसान आन्दोलन

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Gaurav Sarwan मित्र आपकी सोच सात्विक है किन्तु शब्दों के अर्थ देश को बहुत बड़ी क्रांति में झोक देंगे! अगर आप अमीरी-गरीवी को ख़त्म करना चाहते हैं तो शेयर-मार्केट में लगी सम्पूर्ण पूँजी को राष्ट्रीय संपत्ति घोषित कर कब्ज़ा करना होगा! जो काम करेगा वही श्रम का सुख भोगेगा, जन्म से कोई लाला नही होगा और ना ही किसी सरकारी अथवा प्राइवेट कंपनी के प्रमुखों का पद जन्म पर आधारित होगा! हर-पद(सरकारी और प्राइवेट) के लिए खुली प्रतियोगिता होगी तथा सबको इच्छित सामान शिक्षा ग्रहण करने का हक़ होगा जिसका सम्पूर्ण खर्च सरकार उठाएगी! हर प्रकार के श्रमिक(अधिकारी-मजदूर व अन्य ) को अनिवार्य शिक्षाकर देना ही होगा! मात्र किसान और श्रमिको के विरोध में कानून बनाकर देश में समानता नहीं लाई जा सकती है! Gaurav Sarwan Kamlesh Kumar Mittra ब्रदर आपने पढ़ने में गलती की है मैंने भारत के बाकी के राज्यों के किसान को गरीब नहीं कहा है मैंने यह कहा है कि बाकी के राज्य के लोगों के पास बड़ी जमीने नहीं है आप बात को अपनी तरफ मोड़ने की कोशिश कर रहे हो और आप चाहते क्या हो भारत में हमेशा असमानता बनी रहे अमीर और ज्यादा अमीर होता ...

हलाला

Kaushal Pathade सुगर की औलाद, हलाला में तो बाप का नाम मिल जाता है! परन्तु हरिजन में बाप का पता नही चलता जो देव-दासियों की संताने होती थी! देव-दसियों में केवल तुम्हारी बुआ और बहन शामिल थी क्या समझे मंद बुद्धि !

निंदा रस से मुक्त

Vinod Kumar नास्तिकता शब्द आस्तिकता का विरोधी है, विरोध विजय की ओर ले जाता है! ज्ञान की ओर जाने वाले लोग आर्य-सत्य को जान लेने में रूचि रखते हैं वे आस्तिकता और नास्तिकता के बीच से सार को जान लेते हैं! बुद्ध के बताये ब्रह्म-बिहार में रमण करते हैं वे न तो नास्तिको को और न ही आस्तिको को श्रधा अथवा घ्रणा से देखते हैं! मैत्री करुणा मुदिता और उपेखा में रमण करता हुआ व्यक्ति ही आर्य-सत्य से बोधिगाम्य हुआ होता है वह न तो आस्तिक होता है और न ही नास्तिक होता है! नास्तिक शब्द पर मैं कोई नया लेपन करना नही चाहता क्योकि उससे मात्र वाणी विलास उत्पन्न होगा! कालांतर में शब्द सदैव अपना अर्थ बदलते रहते हैं कहने वाला सदैव समसामयिक अर्थो में उसका प्रयोग करता है और उसे उसी अर्थ में समझा भी जाता है! सामान्य जन शब्द विन्यास में नही पड़ता समसामयिक अर्थ स्वीकार करके बात को स्वीकार-अस्वीकार या प्रेम और निंदा करता है! मूल लेख में मुझे ऐसा लगा वैसा मैंने लिख दिया! Gyan Prakash Verma सनातन धर्म में न दया है न करुणा ! सनातन धर्म मनुस्मृति को मानता है! मनु स्मृति में दंड के अमानवीय प्राविधान हैं जबकि आज की दंड विध...

नफरत का सत्य

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मन्त्र

  मित्र, जितेन्द्र यह पूरी तरह वैज्ञानिक प्रक्रिया है और करना अत्यंत कठिन है! सरल होता तो मई ही कर देता! ध्यान से सुने - जब किसी एक शब्द का लगातार उच्चारण किया जाता है तो कंठ और सिर में उस तरह की रसायनिक प्रक्रिया आरम्भ हो जाती है अत्यधिक समय तक करते रहने से, मैग्नेटिक वेव बनने लगती है जिस कारण अडोस-पड़ोस के लोगो के सिर में भी तरंगे उत्पन्न होने लगती है और अन्य लोग भी उसी शब्द का उच्चारण स्वतः करने लगते हैं! इससे एक शब्द में आस्था रखने बालो का संगठन मजबूत हो जाता है! जय श्रीराम, ॐ आदि इसके प्रत्यक्ष उधारण हैं! एक शब्द पर एकत्र हुए लोगो से उस पर कार्य करना आरम्भ कर देते हैं!

विशाल : आया देश विक्रेता -----

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जो समता समानता और बंधुत्व का आचरण करता है, बौद्ध ही है!

  जो समता समानता और बंधुत्व का आचरण करता है, बौद्ध ही है! भाई आपका प्रश्न ही गलत है! प्रश्न ऐसे करो " क्या कोई वाल्मीकि या जाटव मेरी बहन या बेटी (जैसा सत्य हो) से विवाह करेगा"? बैसे आप किसी के मालिक नही हो इसलिए बात अपनी करो और ऐसे कहो अगर अविवाहित हो तो "कि मैं किसी भी वाल्मीकि या जाटव समाज की लड़की से शादी कर सकता हूँ"! अगर आपने ऐसा कर लिया तो आप मनुवाद के बहार आ गए और जो मनुवाद के बाहर आजाता है वह बौद्ध धर्म को मानने वाला ही होगा उसको अलग से कोई घोषणा करने की आवश्यकता नही है! जो आचरण में समता समानता बन्धुत्व को धारणा नही करते मनुवादी-बौद्ध हैं उनका बौद्ध दर्शन से कोई लेना देना नही है! इसलिए मित्र मुझे आपका प्रश्न औचित्य विहीन लगता है! धारण करे तो धर्म है वर्ना कोरी बात -- क्या समझे ?

Dharm

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  धर्म क्या होता है?? आजकल धर्म के नाम पर धंधा करने वाले लोग लोगों को ज्ञान देते हैं कि हमें किसी धर्म की बुराई नहीं करनी चाहिए, और धर्म के नाम पर फर्जी भगवानों और देवी देवताओं का डर बना कर लोगों को ठगने का धंधा कर रहे हैं। ऐसे मूर्खों को सही और मुफ्त में ज्ञान है जरूर पढें। धर्म का अर्थ है धारन करने योग्य धर्म किसी महापुरुष की विचारधारा होती है जो सभी को आपस में जोड़ने की कोशिश करता है और एक समान करने की कोशिश करता ना कि ऊंच नीच का भेदभाव और नफरत पैदा करे बल्कि आपस में प्रेम करना और सही सामाजिक ज्ञान की शिक्षा देता है। कुछ प्रमुख धर्म और उनके धर्म गुरु बुद्ध धम्म तथागत गौतमबुद्ध जैन धर्म महावीर जैन क्रिस्चियन धर्म ईसा मसीह इस्लाम धर्म मुहम्मद साहब सिख धर्म गुरु नानक देव हिंदू धर्म धर्म गुरु??? कोई भी नहीं भारत में हिंदू नामक धर्म के मानने वाले लगभग 60%हैं लेकिन उन्हें पता ही नहीं है कि हिंदू नामक कोई धर्म नहीं है हिन्दू शब्द मुगलों की दी हुई गाली है जिसका अर्थ काला चोर, गुलाम, लुटेरा, काफिर । हिंदू शब्द धर्म के रूप में सबसे पहले 1918 हुआ था उसके पहले हिंदू धर्म कही भी लिखित र...

jatiyan

ब्राह्मणों ने हमारे समाज का राजनितिकरण करके और विभाजन किया हमें राजनीति का सामाजिकरण करना होगा आजादी के बाद ब्राह्मणों को पता चल गया कि अब देश का कारोबार, राजकाज भारत के संविधान से चलेगा और संविधान की नजर में सभी भारतिय बराबर होंगे कोई भी गैरबराबरी कि विचारधारा, व्यवहार ,भेदभाव गैरकानूनी होगा, असंवैधानिक होगा। सबको वोट का अधिकार होगा सभी के वोटों की वैल्यू बराबर होगी वन मैन, वन वोट वन वैल्यू अब लोकतंत्र में कानून जनता दवारा चुनें हुए प्रतिनिधि बनाएंगे इससे हजारों सालों से देश के निति निर्माता, कानून बनाने पर एकाधिकार रखनेवाले, ब्राह्मण निर्मित गैरबराबरी कि समाज सत्ता के मालिक ब्राह्मणों के सामने संकट खडा हो गया। 6743 जातियों में ब्राह्मणों दवारा बांटे गये लोगों को संविधान ने OBC SC ST के रूप में विशेषाधिकार देकर जोड दिया। यही सामाजिक, संवैधानिक समूह जुड जाते हैं तो ब्राह्मणों का एकाधिकार, ब्राह्मणों का वर्चस्व, गैरबराबरी कि उनकी असामाजिक व्यवस्था खत्म हो जाएगी। इसके लिए हजारों सालों से शासक वर्ग रहा ब्राह्मण ने 6743 जातियों में बंटे हुए मूलनिवासी बहुजनों का राजनितिकरण करना शुरु किया, ...

*आरक्षण* बहुत सही गणित है

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*आरक्षण* बहुत सही गणित है ,जरा ध्यान दे हमारे गणित पर । माना कि 100 व्यक्ति हैं। और इन 100 व्यक्तियों कोे खाने के लिए 100 रोटियां हैं। वर्तमान में पिछड़ी जाति *OBC* के *60* व्यक्तियों को खाने के लिए *27* रोटियों की व्यवस्था है। इसी तरह अनुसूचित जाति *SC* व जनजाति *ST* के *25* व्यक्तियों के एक समूह के लिए *22.5* रोटियों की व्यवस्था है। अब सामान्य वर्ग के तकरीबन *15 आदमियों* के लिए *50* रोटियां शेष बचती हैं। पर समस्या ये है कि सामान्य वर्ग *GENERAL* के *15* आदमियों में से *3% ब्राम्हण* जाति के आदमी बेहद *शक्तिशाली* हैं जो शेष बची *50 रोटियों* में से लगभग *45 रोटियां* खा जा रहे हैं। अब समस्या ये है कि *सामान्य वर्ग के 12* आदमियों के लिए मुश्किल से सिर्फ *5 रोटियां* ही मिल पा रहीं है। इसी कारण सामान्य जाति के जाट, मराठा, लिंगायत, पटेल या पाटीदार अपने लिए *OBC* की *27 रोटियों* में हिस्सेदारी मांग रहे हैं। अब समस्या ये है कि *ओबीसी के 60* लोग वैसे ही सिर्फ *27 रोटियों* पर गुजारा करके अपनी जिंदगी चला रहे हैं ऐसे में वो जाट, मराठा और लिंगायत में अपने हिस्से की *27 रोटियां* बांटने को हरगिज तैय...

आरएसएस का शरारती लेख जिससे दलित भ्रमित हो सकते हैं

 आरएसएस का शरारती लेख जिससे दलित भ्रमित हो सकते हैं  Drsubash Chandra दलित और पिछड़ों के जीवन में बहुत बदलाव आया है जिसने अपने बच्चों को थोड़ी सी भी शिक्षा दिला दी है वह सरकारी नीति का लाभ उठाकर आगे बढ़ गए और अगली पीढ़ी में इतना ज्यादा आगे बढ़ गए कि अपने पिछड़े और दलित लोगों को भी भूल गए उनकी मदद नहीं की जि का उत्थान हो गया है वह अपना ही उत्थान करने में लगे रहे जबकि उन्हें अब शासन के दिए हुए लाभ की आवश्यकता नहीं थी अपनी जगह अपने दूसरे दलित भाइयों को दिलानी थी फिर और जल्दी उत्थान होता जिस तरह से योगी ने सफाई कर्मचारियों की नियुक्ति गांव में की है और वह कितनी सैलरी दे रहे हैं की उनके स्थान पर जाट यादव राजपूत जातियां भी पचास परसेंट कम से कम भर्ती हुए हैं जो बालवी क्यों का काम कर रहे हैं बाल्मीकि यूके मेहनतकश कार्य को देखते हुए अब तक उनकी सैलरी बहुत कम थी गांव में उनकी सफाई करने के बदले में केवल हर रोज की एक रोटी दे दी जाती थी बाकी विवाह शादी के मौके पर केवल इनाम के चंद रुपए मिलते थे उनके चारों का रहन-सहन का वातावरण गया अपने बच्चों को शिक्षा दिलाने मैं भी कठिनाई होती थी अब वास्तव ...

बाबरी मस्जिद

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मूढ़ दलित ----

 मूढ़ दलित ---- भाई मेरे, पढ़ने और समझने में अंतर होता है, पढ़ता है कोई भाषा के ज्ञान से और समझता है अपने संस्कारो की जकड़न से, आप क्या समझे ? बाबा साहब ने इस्लाम इसलिए नही ग्रहण किया क्योंकि उन्होंने खोज लिया था कि भारतीयों का धर्म बौद्ध है हिन्दू नही है! इसलिए उन्होंने अपने धर्म में वापसी की! पुष्पेन्द्र द्वारा फैलाई गयी मूर्खताओ से बाहर निकलने का एक रास्ता बताता हूँ ! इव्रहीम लोधी ने लोधी वंश की नीव डाली इव्रहीम लोधी इस्लाम को मानने वाला था! कल्याण सिंह लोधी वंश का है, तो यह हिन्दू कैसे हो गया, इसकी खोज करो? कल्याण सिंह को इतना मूर्ख बना लिया गया कि उसी के हाथो बाबरी मस्जिद गिरवा दी ! मूढ़ताओ से जितनी जल्दी निकल आओ उतना अच्छा है! पुष्पेन्द्र की फैलाई हुई नफरती वीडियो का परिणाम है कि मुस्लिमो का सड़क पर चलना मुस्किल हो गया है! मुस्लिम सोता रहा इसलिए आज वह दुःख भोग रहा है अगर अम्बेडकरवादी सोते रहे तो उनका भी वही हाल होगा जो मुस्लिमो का हो रहा है! मुझे अफशोस है कि SC/ST ग्रुप में लोग इतने सीधे-साधे हैं कि वह यह भी नही समझ पा रहे हैं कि आरएसएस प्रवक्ता पुष्पेन्द्र कुलश्रेष्ठ दलित समाज के ...

पुष्पेन्द्र के झूंठ

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  बाबरी मस्जिद गिराने में इसकी महत्वपूर्ण भूमिका है! उस समय का बीबीसी न्यूज़ का विडियो देखोगे तो यह अटल जी के आगे-आगे चलता नजर आएगा इसलिए आज तक उसके हौसले बुलंद हैं! वह कुरान की व्याख्या अपने ढंग से कर-कर के उसका अपमान करता है तो दूसरी ओर बाबा साहब के कथोनो को तोड़-मरोड़ कर पेस करता है ताकि दलित और मुस्लिम आपस में ही लड़ जाएँ! इसके पापो का घड़ा भर चुका है अब इसको इसके किये का दंड मिलाना ही चाहिए! https://www.bhadas4media.com/old/%E0%A4%AA%E0%A5%81%E0%A4%B7%E0%A5%8D%E0%A4%AA%E0%A5%87%E0%A4%82%E0%A4%A6%E0%A5%8D%E0%A4%B0-%E0%A4%95%E0%A5%81%E0%A4%B2%E0%A4%B6%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A5%87%E0%A4%B7%E0%A5%8D%E0%A4%A0-%E0%A4%AA%E0%A5%8D/?fbclid=IwAR2udnnOL5vq8wzLp6UFD6QeH3iUpjE3_k32sqmlrQyYCgxbOpMYDBFpc1E

राजपूत काल के राज :--

  राजपूत काल के राज :-- Santosh Tiwari तिवारी जी इतना गुस्सा करना अच्छी बात नही है क्रोध में बुद्धि शून्य हो जाती है! अब सुनो "वात्सायन काम सूत्र" राजपूत काल का सर्व प्रिय ग्रन्थ था जोकि व्यभिचार के मार्ग राज्य को सुझाता है, राज्य अत्याचारी और दुराचारी हो गया था! जिसमें राजा तालूकेदार और राज्य अधिकारी अन्य समाज की औरतो के साथ विवाह न करके केवल व्यभिचार किया करते थे जिससे बड़े पैमाने पर अवैध संताने उत्त्पन्न हो रही थी उन संतानों में लडकियों को देवदासी बना कर शोषण किया जाता था तो दूसरी ओर पुरुषों को गुलाम बनाकर युद्ध में झोंक दिया जाता था ! इस कारण राजपूत काल की वीर गाथाएं बहुत प्रचलित हैं क्योकि युद्ध करने वाले अधिकांश पुरुष अवैध संतान होती थी, जिनके खान-पान पर राज्य ज्य्यादा खर्च नहीं करता था उसी का परिणाम है कि सेना कमजोर रहती थी! राजपूतो के आतंरिक युद्ध में इससे ज्यादा फर्क नहीं पड़ा किन्तु जब मुस्लिमो ने आक्रमण किया तो राजपूतो की यह गुलाम सेना उनका सामना नहीं कर सकी और सम्पूर्ण भारत मुस्लिमो का गुलाम होता चला गया! आरएसएस विद्यालय के बाहर की पुस्तके पढोगे तब बुद्धि खुलेगी अन...