चतुर्वेदी चमार

शासन-प्रशासन में आरक्षण का मात्र इतना ही लाभ हुआ है कि कुछ दलितों को पंडितानी, ठकुरानी और लालाइन से बच्चे पैदा करने का अधिकार मिल गया है! उनके बच्चो को फिर से आरक्षण पाने का अधिकार बना हुआ है जिस कारण दलितो (चमार और हेला) की उप-जातियां उत्त्पन्न हो रही हैं! ऐसे लोग खुद को चमार या हेला कहलाना पसंद नहीं करते और कोई न कोई उपनाम धारण कर लेते हैं, इससे ब्राह्मणवाद मजबूत हो रहा है जातियों की संख्या लगातार बढ़ रही है! मुख्य समाज तो आरक्षण के लाभ से बंचित ही रहा है उसके सर्वांगीण विकास के लिये इन दलित नेताओ और प्रशासनिक अधिकारियो द्वारा निष्ठापूर्वक काम नहीं किया गया है! ऐसे दलित अधिकारी और नेता कभी भी दलित समाज के हित में काम नहीं करते और खुद को सवर्ण समाज का दिखाने के प्रयास में दलितों पर ही अत्याचार करते है, ऐसे लोगो को हम मीरजाफर, विभीषण और जयचंद कह सकते हैं! ऐसे व्यक्तिगत प्रगतिवादी सोच के व्यक्तियों को यदि उच्च न्यायालय और उच्तम न्यायालय का जज भी बना दिया जाये तो देश की आम दलित जनता का कोई भला नहीं होगा! इसलिए आवश्यक है पहले ऐसा कानून लाया जाये जिसमें जिस व्यक्ति ने सवर्ण महिला या पुरुष से विवाह कर लिया है उनके बच्चो को आरक्षण का अधिकार नहीं मिलना चाहिए तथा दलितों पर होने बाले अत्याचार में ऐसे अधिकारियो और नेताओ की सयुंक्त भागीदारी पाई जाती है तो उसे सामान्य श्रेणी की तरह आरोपी बनाया जाये और दण्डित किया जाये!

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