जातियों का उत्थान और पतन भाग -२

जातियों का उत्थान और पतन भाग -२

Arvind Kumar Meena जी दो चीजे हैं एक है राजनीति है दूसरी है विज्ञता, हमारा पूरा समाज विज्ञ होना चाहिए जातियों के बारे में और जातियों के उत्त्पति और विकास के बारे में ! राजनीति मेरा विषय नही है मेरा प्रयास मात्र इतना ही है जो ब्राह्मणों ने घाल-मेल कर रखा है उसको परिशुद्ध कर समाज के सामने पेश करना ! जिस प्रकार हर व्यक्ति बचपन से लेकर बुढ़ापे तक सैंकड़ो बार गिरता-उठता है, तथा चेहरे का परिवर्तन होता रहता है! उसी प्रकार जातियों का उत्थान-पतन और विकास तथा पहचान में परिवर्तन होता रहता है! अगर ६७ हजार जातियां हैं तो भी मैं इनके लिए काम करूँगा क्योंकि मुझे सूत्र पता है आप भी जान लें !

दो विभिन्न प्रदेशिक जातियों का किसी स्थान विशेष पर संयोगिक मिलन के बाद दो स्थितियां उत्पन्न होती हैं - मोहब्बत या नफरत, प्रेम या संघर्ष या तो एक मिट जाती है अगर नहीं मिटती तो एक शीत-युद्ध आरंभ हो जाता है! इस शीत युद्ध में दैनिक आवश्यकताओ की पूर्ती के सम्बन्ध स्थापित होने लगते हैं, दिखावे के संस्कृतिक सम्बन्ध भी चलते रहते हैं और युद्ध की तैयारी भी चलती रहती है! कभी-कभी अहंकार चरम पर पहुँचता है तो रक्तपात भी होता है और फिर शीत-युद्ध! भारत के सम्बन्ध में एक चीज विशेष है "जातियों की उत्त्पति" वैसे तो सम्पूर्ण विश्व में प्रदेशिक जातियों में अंतर्संबंध होते रहे हैं किन्तु उन्होंने ने इसे अधिक महत्व नहीं दिया इसलिए स्थायी जातियों की स्थापना नहीं हो पायी, जातियों की पिछली पहचान तीसरी पीढ़ी तक स्वतः समाप्त हो जाती रही है! भारत में ऐसा नहीं हुआ यहाँ प्रतिरोधी समाज के साथ अंतर्संबंध तो किये गए किन्तु उत्पन्न संतानों को सदैव सन्देह की द्रष्टि से देखा गया और उन्हें युद्ध के समय नेतृत्व नहीं दिया जाता था क्योकि वे धोखा दे सकते थे! सेना की भारती के समय इस बात का विशेष ध्यान रखा जाता था कि कौन किस वंश से होकर आया है? और युद्ध के मैदान में उस पर कितना विश्वास किया जा सकता था? कोई भूल से सेना में कोई प्रमुख पद न पा जाये जिसके लिए राजा को विशेष हानि उठानी पड़े इसलिए नामकारण संस्कार को अनिवार्य संस्कार बना दिया गया था तथा पुरोहित के माध्यम से नाम का रखा जाना अनिवार्य कर दिया गया ताकि मूढ़जन जब अपना नाम अपने बाप और दादा का नाम बताये तो उसके डीएनए को पकड़ लिया जाये!

नामकरण संस्कार की लोकप्रियता के कारण पुरोहित समाज प्रतिष्ठित समाज हो गया और उसने शरीर लक्ष्ण के आधार का अध्ययान करना आरम्भ कर दिया और उसके आधार पर भविष्यवाणियाँ करना आरम्भ कर दिया इसलिए वह और प्रतिष्ठा पाने लगा अधिक लोभ के चक्कर में उसने कुछ अन्य कर्मकांड भी बना डाले जो बाद में उसके प्रतिष्ठित समाज के पतन का कारण बने! क्षत्रिय समाज में युव-राज और राजपूत और विभिन्न राजपूतो में भेद करने के लिए जातियों की रचना हुई! वैश्यों में भी इसी प्रकार जातियों का उदय हुआ! प्रदेशिक नामकारण के आधार पर जैसे श्रावस्ती राज्य के व्यापारियों को अन्य राज्यों में श्रीवास्तव कहा जाता था, इसी प्रकार मथुरा के व्यापारियों का माथुर कहा जाता था आदि! वर्णात्मक जातियों में उपजातियो का उदय कार्य विभाजन के आधार पर होने लगा जैसे - चमारो में मोची, जाटव रेंगर आदि इसी प्रकार हेला में मेहतर खटिक और पासी आदि, निषाद में मल्लाह केवट आदि इस प्रकार विभाजन की एक लम्बी श्रंखला है! कुछ जातियों का उदय तो केवल व्यभिचार के आधार पर हुआ और उनको उसी काम में लगाये रखा गया जैसे "हरिजन और देव-दासी "आदि! कुछ जातियां अपने मूल कार्यो से पलायन कर गयी! उनका अलग ही नाम और पहचान हो गयी जैसे महाबाभन में "त्यागी " आदि! चमारो में आंबेडकर और गौतम या बौध!

अनुलोम और प्रतिलोम संबंधो के आधार पर भी जातियों का निर्माण हुआ जैसे - ब्राह्मण पुरुष और शुद्र स्त्री से उत्पन्न होने वाली संतान को निषाद कहा जाता था जो आज अलग पहचान लिए हुए है ! इसके ठीक उलट ब्राह्मण स्त्री और शुद्र पुरुष के संयोग से उत्पन्न संतान को चंडाल कहा जाता था और समाज से दूर मरघट पर महा-बाभन ब्राह्मण के कामो में सहयोग के लिए रखा जाता था ! लाशो के दाह संस्कार करने के कारण उसके शरीर से बदबू आती थी इसलिए वह अस्प्रश्य हो गया! युद्ध क्षेत्र में मारे गए हजारो सैनिको का दाह संस्कार महा-बाभन के सुपरवीजन में चंडाल द्वारा किया जाता था ! यह भी बड़ा जटिल विज्ञानं है बांकी फिर कभी .....

Comments

Popular posts from this blog

चमार मूलत बौद्ध है-ओशो

दलित शब्द का अर्थ

यादवो की मूर्खताएं