दलित(शुद्र) कौन ?

दलित(शुद्र) कौन ?

दलित न कभी हिन्दू था, न ही उसे कभी हिन्दू माना गया, (इस बात को बाबा साहब ने गोल-मेज सम्मलेन लन्दन में सिद्ध कर चुके हैं जिसे ब्रिटिश सरकार ने भी स्वीकार कर लिया था इसलिए यह कहना कि दलित हिन्दू धर्म छोड़ दें एक मूढ़ता पूर्ण बात है) दलितो का सत्यानाश विवेकानन्द ने किया जब उन्होंने भारत विभाजन की नीव डाली और कहा कि "गर्व से कहो कि हम हिन्दू हैं"! ( वे यह भी कह सकते थे हम भारतीय हैं, हम जम्बूदीप के वाशी हैं, हम महान सम्राट अशोक के धर्म को मानने वाले बौध है परन्तु वह विद्वेष-भाव और जाति के अहंकार से ग्रस्त थे मुस्लिम से नफरत करते थे इसलिए उनके दिमाग में इतना ही आया कि हम महान संस्कृति को मानने वाले हिन्दू हैं उनके इस भाषण के कारण धर्म पर आधारित हिन्दू-मुस्लिम विभाजन की नीव पड़ी और धर्म के आधार पर बंगाल का विभाजन कर दिया गया! यही दंश आजादी के समय सन १९४७ में भारत की जनता को भोगना पड़ा है, भारत को विभाजित कर दो देश भारत और पाकिस्तान की नीव पड़ी है) युवा-बौध (दलित) अपने अतीत से अंजन थे और भ्रमित हो गए कि वे किधर जाएँ ! वे भी स्वयं को हिन्दू कहने लगे जबकि उनको समझाया गया कि तुम हिन्दू नहीं हो, मंदिर-प्रवेश में उन पर प्रतिबन्ध लगाया गया! मूढ़ दलितो को यह बात समझ नहीं आयी क्योंकि भारत में बौध-साहित्य को नस्ट कर दिया गया था इस कारण युवा-बौध (दलित) धर्म-विहीन हो गये ! कुछ सिक्ख होने लगे, कुछ क्रिश्चन, कुछ मुस्लिम आदि ! इसी बात की खोज बाबा साहब ने की कि दलित(शुद्र) कौन ? उन्होंने बताया कि दलितों का "विजय स्तंभ" भीमकोरे गाँव में है जो एक जनवरी १८१८ को स्थापित किया गया था तथा दलितों का धर्म बौध है! इसलिए दलितों को न तो हिन्दू-धर्म छोड़ना की जरूरत है क्योंकि उन्होंने कभी पकड़ा ही नहीं था! सभी दलित आरम्भ से प्रकृति के पूजक रहे है आनन्द बोधि वृक्ष (पीपल का वृक्ष) भगवान बुद्ध द्वारा स्थापित है इसलिए दलितों को बौध धर्म ग्रहण करने की कोई जरुरत नहीं है क्योंकि वे मन-कर्म और बचन से जन्मजात बौध जाने जाते हैं !

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