जाति का आत्म गौरव-

आत्म गौरव-

बाबा साहब ने कहा था कि भारत में केवल धर्म बदला जा सकता है जाति नहीं इसलिए बाबा साहब ने धर्म बदला, इस धर्म में भी जाति घुसी हुई है! ब्राह्मण वंशीय भिक्खु दलित और पिछड़े समाज से आये भिक्षुओ से ज्यादा कमा लेते है अधिक देखना है तो सारनाथ, कुशीनगर श्रावस्ती और कपिल वस्तु में जाकर देख सकते हो! एक भिक्षु ने तो मुझसे यह तक कह दिया कि "बाबा साहब, 'बुद्धा एंड हिज धम्मा' न लिखते तो समाज पर बहुत उपकार होता"! वे हमारे घनिष्ट मित्र हैं ब्राह्मण समाज से भिक्षु बने हुए हैं किन्तु उनकी बात मुझे बार-बार चुभती है ! एक अन्य सन्यासी जिनकी बुद्ध में बड़ी आस्था है उन्होंने अपनी जटा कटवा ली है! वह बुद्ध पद्दति से ध्यान करते है किन्तु जब भी मौका मिलता है तो भागवत कथा भी कर लेते हैं जोकि बुद्ध धम्म में वर्जित कर्म है इसलिए बुद्ध धर्म में भी बड़ा लोचा है! पञ्च सील का पहला सूत्र है अहिंसा किन्तु बुद्धिस्ट बड़े चाव से मीट खाते हैं कुछ मदिरा का सेवन भी करते हैं और कुछ तो बड़े महान हैं उनकी चर्चा भी यहाँ पर करना उचित नहीं है !

बहुत कम लोग जानते हैं खासतौर से उत्तर भारत में कि बाबा साहब ने नागपुर में बुद्ध धर्म की शिक्षा ली थी, जिसमें उन्हें मिला " त्रि-शरण और पञ्च सील" किन्तु इसके बाद चन्द्रपुर में उन्होंने अपने पांच लाख अनुयायियो को बुद्ध धर्म की शिक्षा दी तो उन्होंने दिया " त्रि-शरण, पञ्च सील और २२ प्रतिज्ञाएँ दी " आम्बेडकरवादी सामान्य बौधिस्ट से जो अलग करते हैं वह २२ प्रतिज्ञाएँ हैं! सभी जातियों में आत्म गौरव जगाये बिना जाति विभाजन को ख़त्म नहीं किया जा सकता! जब व्यक्ति को अपनी जाति पर गौरव जगता है तब वह सामाजिक वार्ता में भागीदारी करता है और जब वह तर्क-वितर्क करता है तब उसका मानसिक विकास होता है जब उसका मानसिक विकास होता है तब वह आर्थिक उन्नति के मार्ग खोजता है इसलिए हमें सबसे पहले दलित जातियों में जाति के नाम पर दब चुकी प्रतिभाऔर प्रतिष्ठा को उभारना होगा उपजातियों का मूल जाति में गौरवमय इतिहास दिखाना होगा क्योकि ब्राह्मणवाद ने अपनी जाति का प्रभुत्त्त स्थापित करने के लिए अन्य जातियों का गौरवमय जातिगत इतिहास मिटा दिया है युवाओ को इसकी जानकारी होगी तब उन में आत्म गौरव जागेगा, फिर कोई भी धर्म अपनाओ भीरुता और बुजदिली नहीं रहेगी !

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