सच्चा ब्राह्मण + पाप-पुन्य

सच्चा ब्राह्मण

मित्र, सच्चा ब्राह्मण मनुष्य से एक तल ऊपर होता है वह शरीर में नहीं रहता, शरीर की मनमानी को भी स्वीकार नही करता, शरीर की लाचारी को भी स्वीकार नहीं करता, प्रकृति के सत्य का बोध करता है औरो को करने में उनकी मदद करता है! इसलिए वह शरीर के हर किये गये पाप और पुन्य के कार्य से मुक्त रहता है !


पाप और पुन्य का खेल->
पाप और पुन्य का खेल भी इसी प्रकार है एक को पुन्य लगता है दूसरे को पाप लगता है, सत्य का वोध होते ही विचार बदलने लगते हैं जैसे - बाल्मीकि जी को ही कभी डकैती करना धर्म लगता था किन्तु जब बोध हुआ तब सब छोड़ कर ऋषि बन गए ! कुछ चीजे समय के साथ समझ आने लगती हैं चर्चा से समझ नहीं आती कोई भी किसी को पाप-पुन्य नहीं समझा सकता जब तक उसकी स्वयं की बोधि न जागे !

सेक्स-वर्क मजबूरी या मूर्खता -
आपके इस लेख में प्रश्न भी हैं और उत्तर भी - ध्यान से देखो सही जगह चोट करो ! शरीर भोजन से तैयार होता है, तैयार शरीर ही समाज से संस्कार ग्रहण करता है! तामसिक शरीर, तामसिक संस्कार ग्रहण करता है और सात्विक शरीर सात्विक संस्कार ग्रहण करता -> भोजन नियंत्रित होता है काल, स्थान और परिस्थिति के अनुसार ! जो इनका ध्यान रखे बगैर प्रोत्साहनवस या अज्ञानता में भोजन ग्रहण करेगा विकृत मानसिकता का हो जायेगा, हम अपना भोजन ठीक कर लें तो अन्य के प्रकोप से बचे रहेंगे! शेर हमारी माद के सामने बैठा है हम बाहर निकलेगे ही नहीं उसके भोजन के समय तो वह निराश होकर खुद कहीं और चला जायेगा! रास्ते बहुत से हैं - "जहाँ चाहं वहां राह होती ही है" ! पाप कर्म, पाप कर्म ही होता है और पाप फल ही लाता है ! सेक्स वर्कर की अगली पीढ़ी साथ रहकर सम्मानित जीवन जीने के लिए मानसिक रूप से तैयार नहीं हो पाती है यह एक अछम्य अपराध है !

पुन्य की पूँजी-
अमरियादित रास्ते सदैव सरल होते हैं, सरलता में त्याग और तपस्या की जरूरत नहीं होती ! परन्तु संकट काल में कोई मददगार नही होता यही पाप और पुन्य के हिसाब का क्षण होगा! प्रेम के क्षण में किसी एक के साथ गुजारी गयी एक रात भी जीवन भर का सहारा हो जाती है! चांदी के सिक्को की चमक के लिए सैकड़ो के साथ गुजारी गयी राते भी विपरीत काल में काम नहीं आती हैं ! पाप से भरी इस दुनिया में सहानभूति जताने वाले तो बहुत मिल जायेंगे पर मदद करने वही आएगा जहाँ कभी पुन्य की पूँजी कमाई होगी!

उथले तल के रिश्ते -
भगवान बुद्ध का वैशाली की नगर-बधू से प्रेम सम्बन्ध था जैसा संतो का होता है! जब चिंचा की हत्या कर के विरोधियो ने उसे भगवान बुद्ध के आश्रम के पीछे डाल दिया तो नगर वासियों को भिक्षुओ पर संदेह हुआ और पूरे नगर में बुद्ध और भिक्षुओ की निंदा की जाने लगी, कोई उनको भिक्षा नहीं देता था दिन गुजरने लगे और आश्रम में भुखमरी छाने लगी! जब यह खबर वैशाली की नगर बधू तक पहुंची तो उसे आश्चर्य हुआ कि कोई भगवान बुद्ध के चरित्र पर भी संदेह कर सकता है ? वह वैशाली से पर्याप्त खाद्य सामग्री लेकर भगवान बुद्ध के आश्रम पहुँच गयी और सभी भिक्षुओ के प्राण बचा लिये! जगत में प्रेम का रिश्ता अमर होता है शरीर के तल पर बनाया गया रिश्ता मिट जाता है और किसी कम नहीं आता है !

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