मेधा की हत्या क्यों ?

मेधा की हत्या क्यों ?

अनुसूची कोई जाति नहीं है - अनुसूची में जातियां है कुछ अस्प्रश्य जातियां हैं और कुछ राजनीतिक लाभ के लिए जोड़ी गयी जातियां हैं! इसी प्रकार कुछ वास्तविक पिछड़ी जातियां है कुछ बनाई गयी पिछड़ी जातियां हैं राजनीतिक लाभ के लिये जैसे गुजरात की मोदी जाति एक पिछड़ी जाति है! मित्र चर्चा तो करनी ही पड़ेगी क्योंकि अरुण मिश्रा ने चुनौती दी है! मैं कई बार अरुण मिश्रा को सुनाता हूँ उनके सामने बैठकर यदि केस सही ढंग से प्रस्तुत नहीं किया जायेगा तो अरुण मिश्रा से किसी प्रकार की अनुकम्पा की अपेक्षा नहीं करनी चाहिए, कोई भी जज साक्ष्यो के सहारे चलता है और साक्ष्य आप तभी दे सकते है जब आपको अपनी हकीकत पता हो आप चर्चा करने में शर्म महसूस करते हैं तो साक्ष्य कहाँ से लायेगे? फिर अरुण मिश्रा से कृपा की अपेक्षा करना बेईमानी है! बाबा साहब ने गाँधी का विरोध करते हुए कहा था कि " हम हरिजन नहीं है" परन्तु कहीं यह कहा है कि हम "चमार" या "महार" नहीं हैं तो दलित समाज को अपनी जाति की चर्चा करने में शर्म क्यों महसूस होती है? यह ब्राह्मणवाद और आरएसएस का षड्यंत है ताकि आप को अपनी जमीनी हकीकत कभी पता न लगे और आरक्षण का लाभ उनके लोग लेते रहे ! ७० साल में अनुसूचित जाति के आरक्षण का लाभ वे जातियां लेती रही हैं जो राजीनीतिक रूप से इस अनुसूची में जोड़ी गयी थी किन्तु वे अस्प्रश्य नहीं थी जैसे धोवी, कोरी, कुरील आदि इसी प्रकार एस.टी. की जातियां है! कोई दलित नेता नहीं चाहता इस विषय पर चर्चा हो क्योकि इससे उसका वोट बैंक कम होता है भले ही अस्प्रश्य समाज हजारो वर्ष तक गड्ढे में पड़ा रहे! इसलिए मित्र अब चर्चा तो करनी ही पड़ेगी! इस धरती पर आरक्षण से ज्यादा जरुरत आर्थिक समानता की है और बाबा साहब के इस सपने को पूरा करना ही पड़ेगा ! आर्थिक असमानता को दूर कर सबको जन्म से सभी संसाधनों के समान उपभोग करने का अधिकार होना चाहिए तभी मेधा का सही उपयोग और विकास होगा !

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