पाली भाषा का इतिहास और सीमायें
पाली भाषा का इतिहास और सीमायें
मेरे पास ऐसी कोई सूचना नहीं है जिसके आधार पर यह कहा जा सके कि रामायण का कोई पाली संस्करण है जबकि दक्षिण भारत में कन्नड़ में रामायण का संस्करण है, वे लोग अपनी भाषा को छः हजार साल पुराना मानते हैं और उन्हें अपनी भाषा पर गर्व है ! पाली भाषा नही है बल्कि बुद्ध काल में जो क्षेत्रीय भाषाएँ चल रही थी उनको आपसे में जोड़ने के लिए जो ग्रामर बनायी गयी थी उसे पाली कहा गया! जब बुद्ध साहित्य का संकलन तिपिटक रूप में किया गया तब पाली नामक भाषा अस्तित्व में आयी जिसका श्रेय भगवान बुद्ध के अरहंत शिष्य कच्चायण को जाता है! भगवान बुद्ध की कोई भी वाणी पाली में नही है! उनके अधिकतम प्रवचन श्रावस्ती में दिये गए इसलिए उसकी भाषा को कौशली कहा जाता था, जब वह मगध में प्रवचन देते तो मागधी बोलते और जब वैशाली में बोलते तब वहां की स्थानीय भाषा में! "पाली" भाषा के रूप में प्रथम संगीति में आयी जिसके अध्यक्ष महाकश्यप जी थे! बुद्ध काल में वाल्मीकि रामायण चर्चा का विषय नहीं थी इसलिए उसको पाली में अनुवाद किये जाने का कोई मतलब भी नहीं था! सम्राट अशोक के धम्म प्रचार के साथ ही तिपिटक सम्बंधित देशों में चला गया साथ ही पली भाषा भी चली गयी ! सुंग पुष्यमित्र के शासन काल में पाली भाषा और बुद्ध साहित्य भारत से विलुप्प्त हो गया! श्रीलंका में तिपिटक पर शोध चलता रहा ! छः सौ ईस्वी से बारह सौ ईस्वी तक श्रीलंका में ही तीन भिक्कू हुए जो पाली भाषा पर शोध कार्य करते रहे, वर्तमान में उसी को पाली समझा जाता है!
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