हम भारतीय होने वाले हैं -

हम भारतीय होने वाले हैं -
मित्र आपकी चिंता अपने अनुभव के आधार पर उचित ही होगी किन्तु मैं अभियांत्रिकी से जुड़ा रहा हूँ मैंने ऊँची-ऊँची कंक्रीट की बिल्डिंग देखी हैं और उनके बनने की प्रक्रिया भी देखी है! अच्छा कंक्रीट वह होता है जो एक जैसा होता है उसमें दरारे नहीं पड़ती! कंक्रीट को तोड़ कर कूटकर छान कर बराबर किया जाता है अन्यथा कंक्रीट के मसाले में आया घास का टुकड़ा या रोड़ा भी दरार दे जाता है! पूरी बिल्डिंग ख़राब कर देता है! बाबा साहब ने तोड़े बिना और छाने बिना समाज का गठन किया और अंतिम समय पच्छताये कि ऐसे लोग संसद और विधान सभाओ में पहुँच रहे हैं, जो समाज का प्रतिनिधित्व नहीं करते हैं, पार्टी के हुक्म के गुलाम हैं! संसद संसदीय प्रणाली न होकर राजतन्त्र हो गयी है, देश संविधान के अनुसार राज्य के नीति-निदेशक तत्व पर काम न करके एक व्यक्ति की इच्छा पर काम कर रहा है लोक-तांत्रिक देश राजतंत्र की तरह काम कर रहा है, इस दुःख ने ही उनके प्राण ले लिये! समय बीतता गया लोग भूलने से लगे थे कि बाबा साहब क्या चाहते थे? कैसा भारत चाहते थे? माननीय काशीराम ने पुनः अलख जगाई किन्तु समाज को जोड़ने में उनसे भी वही चूक हुई जो बाबा साहब से हुई थी! खत-पत्बार और रोड़े ने बसपा को बार-बार तोडा, अपमानित किया और कराया है! मैं किसी राजनीतिक दल का प्रतिनिधि नहीं हूँ बनने वाली बिल्डिंग भी मेरी नहीं है फिर भी मैं इस मसाले को कूटकर छानकर तोड़कर अच्छे से तैयार करूँगा ताकि ख़त-पत्बार और रोड़ा कंकरीट के मसाले से अलग रहे! मेरे रहते न तो कोई ब्राह्मण-वंशी भारत से निष्कासित किया जा सकेगा और न ही कोई मुस्लिम या अन्य! मुस्लिम डरे हुए हैं कि हिन्दू मुझे देश से निकाल देंगे, तो दूसरी ओर ब्राहमण-वंशी डरे हुए हैं कि भीमटे उन्हे देश से निकाल देंगे इसलिए पूरे देश में नाना प्रकार के षड्यंत्र चल रहे हैं और पूरे देश में अराजकता फैली हुई है! इस आराजकता को शुद्धता से ही दूर किया जा सकता है! शुद्धता तो तोड़ने से कूटने से और रोड़े को छानने से ही आएगी! मुझे वोट-बैंक से कुछ लेना देना नहीं मुझे तो विशुद्ध भारतीय समाज चाहिए है, जिसे मैं बना के रहूँगा! मैं किसी नयी जाति या उप-जाति को जन्म नहीं दूंगा पुरानी जातियों को परिशुद्ध कर दूंगा ताकि लोगो को उपजातियो को बनाने और उनके पीछे छिपने की आवश्यकता ही न पड़े! मुझे नहीं लगता दुबारा इस गूढ़ विषय पर चर्चा करने की आवश्यकता होगी! चर्चा में सम्मलित होते रहे, जितने भ्रम दूर हो जायेंगे उतने ही गौरव से अपनी जाति का नाम ले सकेंगें ! जातियों का नाम लेना सीख जायेगें तो उपजातियो का नाम लेना अपने आप छूटने लगेगा! जब सब जातियों की ज्ञान, धन और शासन-शक्ति में समान भागीदारी होने लगेगी तो लोग जाति का नाम भी भूलने लगेगें क्योकि विश्व एक गाँव है तब हमारी एक ही पहचान होगी कि हम भारतीय हैं !

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